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शिवभारतम् • अध्याय 18 • श्लोक 23
इति चित्ते विनिश्चित्य स शिवः पुरुषोत्तमः । नरानधिकृतांस्तत्तत्कार्येष्ववहितान् हितान्। स्वयं षाड्‌गुण्यनिपुणः परवीरविमर्दनः । सन्दिश्य निजसेनान्यं रिपुराराष्ट्रविकर्षणे ।। नियुज्य निजराष्ट्रस्य दुर्गाणां चाभिगुप्तये ।। परीतः पत्तिसैन्येन जयवल्लीमुपागमत्।।
ऐसा मन में निश्चय करके उस पुरुष श्रेष्ठ शिवाजी ने अपने सेनापति को शत्रु के राज्य का विध्वंस करने का आदेश देकर तथा अपने राज्य को एवं दुर्ग की रक्षा करने में निपुण, हितकारी अधिकारी लोगों को नियुक्त करके, संधिविग्रह आदि छः गुणों में निपुण एवं शत्रुवीरों का मर्दन करने वाला वह शिवाजी स्वतः पदाति सेना के साथ जयवल्ली आया।
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