निगृह्य बाजराजं तं कृष्णराजं च दुर्मदम्। जनकं च तयोश्चन्द्रराजमाजी महौजसम् ।। अव्यक्तवर्तनीयुक्तां सह्यपर्यन्तवर्तिनीम्। अटवीप्रायविषयो महादुर्गसमाश्रयाम्।। उन्निद्रसैनिकोदग्रामद्रिप्राकारमध्यगाम्। जयवल्लीं नाम पुरीं अग्रहीदुर्ग्रहां शिवः ।।
बाजराज एवं उन्मत्त कृष्णराज और उन दोनों के पिता महान् बलवान् चन्द्रराज को युद्ध में मार करके, गुप्तमार्ग से युक्त, सह्याद्री के किनारे बसी हुई, सघन वृक्षों से युक्त तथा किले के आश्रय से युक्त, जागरुक सैनिकों के कारण से भयंकर एवं पर्वतों के मध्य में स्थित, ऐसी जयवल्ली नामक दुर्जेय नगरी को शिवाजी ने अधिग्रहीत किया।
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