मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें

अध्याय 1 — कुण्डीक उपनिषद्

कुण्डीक
28 श्लोक • केवल अनुवाद
वेदों का अध्ययन पूर्ण करने के पश्चात् ब्रह्मचर्य आश्रम की समाप्ति पर गुरु की सेवा में लगे हुए जिस पुरुष को गुरु (अपने घर) जाने की आज्ञा प्रदान कर देते हैं, वह आश्रमी कहलाता है।
बुद्धिमान् मनुष्य को चाहिए कि वह अपने अनुकूल स्त्री को स्वीकार करे तथा अपनी शक्ति के अनुसार अग्नि को ग्रहण करके ब्रह्मयज्ञ में संलग्न रहकर अपना जीवन-यापन करे।
तदनन्तर अपने पुत्रों में धन का विभाजन करके तथा ग्राम (गाँव-घर) से सम्बन्धित सभी कार्य उन्हें सौंपकर पवित्र देश (क्षेत्र) में भ्रमण करते हुए वन के लिए प्रस्थान करना चाहिए।
संन्यासी को वायु अथवा जल का सेवन करके अथवा विहित (शास्त्रानुमोदित) कन्द-मूल आदि से सतत अपने शरीर की रक्षा करनी चाहिए। साथ ही (संसार को) शरीर तक सीमित मानकर (मोह-ममतावश) अनुताप नहीं करना चाहिए।
परन्तु इतने सामान्य से कर्म का पालन करने मात्र से कोई भी व्यक्ति संन्यासी नहीं कहलाता। यह तो केवल साधारण नियम का पालन है। संन्यासी के नियम इससे कहीं अधिक श्रेष्ठ बताए गए हैं।
इसके लिए फल की इच्छा न रखते हुए संन्यास-धर्म के अनुसार मुक्ति की साधना करनी चाहिए तथा वर्णाश्रम-व्यवस्था एवं अग्नि का परित्याग करके वानप्रस्थ आश्रम में प्रवेश करना चाहिए।
साधारण लोगों की भाँति स्त्री एवं सांसारिक सुखों का परित्याग करके वन में जाकर अनुष्ठान आदि करने से क्या लाभ है?
अथवा गर्भवास के भय से ठंडी-गर्मी, सुख-दुःख आदि से भयभीत हुआ मनुष्य सांसारिक भोगों का त्याग क्यों करता है?
इस प्रकार के कृत्य करने का कारण यही है कि वह (संन्यासी) उस गूढ़ परमपद में प्रविष्ट होने की इच्छा रखता है। वह मृत्यु को जीत लेने वाले महाकाल का सतत स्मरण करता रहता है। वह सदा आध्यात्मिक मन्त्रों का जप करता है तथा काषाय (भगवा) वस्त्र धारण करके दीक्षा ग्रहण कर लेता है। कुक्षि (कोख-काँख) और उपस्थ (जननेन्द्रिय) स्थान के बालों को छोड़कर अन्य सभी बालों का क्षौर करा लेता है। वह अपनी दोनों भुजाएँ ऊपर उठाकर इच्छानुसार भ्रमण करता है। गृह-विहीन होकर वह भिक्षा ग्रहण करके जीवन-यापन करता है। उसे निदिध्यासन करते रहना चाहिए। जन्तुओं से संरक्षण के लिए पवित्री धारण किए रहना चाहिए। कमण्डलु, चमस, छींका, त्रिविष्टप, जाड़े से रक्षा के लिए गुदड़ी तथा कौपीन (लँगोटी)
स्नान करने के लिए धोती एवं अंगौछा अपने पास रखना चाहिए। इन वस्तुओं के अतिरिक्त अन्य सभी वस्तुओं का संन्यासी को परित्याग कर देना चाहिए।
(वह यदि) चाहे, तो अपनी इच्छानुसार नदी के तट पर शयन करे। बिना किसी विशेष कारण के शरीर को सुख-दुःख आदि के द्वारा कष्ट नहीं देना चाहिए।
स्नान, पान तथा शौच आदि के लिए शुद्ध जल का ही सेवन करना चाहिए। वह न तो स्तुति एवं प्रशंसा से प्रसन्न हो और न ही निन्दा अथवा अपमान होने पर किसी को शाप आदि दे।
भिक्षा के लिए पात्र तथा स्नान आदि के लिए जल जिस किसी भी प्रकार से उपलब्ध हो, उसी को ग्रहण करना चाहिए। इस प्रकार अनुपम एवं श्रेष्ठ आचरण को स्वीकार करके यति को सदा जप करते रहना चाहिए।
सुधीजनों को अपने मन में यह भावना करनी चाहिए कि यह विश्वरूप ब्रह्म और मनु, अर्थात् प्रणवरूप अक्षरब्रह्म, दोनों एक ही हैं। आकाश से वायु, वायु से ज्योति (अग्नि), ज्योति से जल और जल से पृथ्वी—इन सभी भूतों में जो अविनाशी ब्रह्म सर्वत्र व्याप्त है, ऐसे उस (ब्रह्म) को मैं प्राप्त हुआ हूँ। मैं अजर, अमर, अक्षर और अव्यय को (मैं) प्राप्त हुआ हूँ। मैं अखण्ड सुख-सागर स्वरूप हूँ। मेरे भीतर अनेक लहरें मायारूपी वायु के द्वारा प्रादुर्भूत होती हैं और उसी में विलीन हो जाती हैं। (यहाँ ब्राह्मी चेतना के सूक्ष्म से स्थूल में क्रमशः अवतरण का ध्यान बताया गया है। आगे इसी चेतना के स्थूल से सूक्ष्म में आरोहण की साधना पर भी प्रकाश डाला गया है।)
मेरा इस शरीर से उसी प्रकार का कोई सम्बन्ध नहीं है, जैसे आकाश का मेघ से कोई सम्बन्ध नहीं होता। अतः इस शरीर की जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति आदि अवस्थाओं से मेरा (जीवात्मा का) क्या सम्बन्ध है?
मैं (जीवात्मा) आकाश की भाँति कल्पना से परे हूँ, सूर्य के सदृश अन्य सुनहले आकर्षक पदार्थों से पृथक् हूँ, पर्वत की भाँति सदा स्थिर रहता हूँ तथा समुद्र की तरह अपार हूँ।
मैं ही नारायण हूँ। नरकान्तक (नरकासुर का वध करने वाले), पुरान्तक (त्रिपुरासुर का वध करने वाले), पुरुष तथा ईश्वर भी मैं ही हूँ। मैं ही अखण्ड बोधस्वरूप, समस्त प्राणियों का साक्षी, ईश्वररहित (मेरे ऊपर नियन्त्रण करने वाला कोई नहीं), अहंकाररहित तथा ममतारहित हूँ।
अब प्राण एवं अपान के अभ्यास के विषय में वर्णन करते हैं। वृषण तथा गुदा के मध्य दोनों हाथों को रखें। दाँतों से जिह्वा को शनैः-शनैः दबाते हुए उसे लगभग एक जौ के बराबर बाहर निकालें।
माषमात्र (उड़द के बराबर) लक्ष्य का अनुसंधान करके दृष्टि को श्रोत्र और पृथ्वी पर स्थिर करें। जिससे श्रवण (शब्द) और नासिका में गन्ध स्थापित न हो सके। (—आगे के मन्त्र क्रमांक २०, २१ और २२ में सभी तन्मात्राओं को रुद्ध करके हृदय के तप से उत्पन्न नाद के माध्यम से आत्म-चेतना को ब्राह्मी चेतना के साथ संयुक्त करने की साधना का संकेत है। इसके लिए देहस्थ सभी तन्मात्राओं को संयमित करने की स्वानुभूत प्रक्रिया का संकेत ऋषि ने मन्त्र क्रमांक १८ और १९ में किया है। इसमें स्थूल और सूक्ष्म क्रियाओं का समन्वय है। शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध—इन पाँचों तन्मात्राओं को बाह्य संवेदनाओं से असम्बद्ध करके ही अन्तःअनुभूति में प्रवेश किया जा सकता है। ध्यान में नेत्र बन्द करने से अग्नि की तन्मात्रा 'रूप' के बाह्य संकेत अवरुद्ध हो जाते हैं। मन्त्र १८ के अनुसार संयम, धारणा, ध्यान और समाधि के द्वारा स्पर्श एवं रस की तन्मात्राएँ अन्तर्मुखी होती हैं। मन्त्र १९ में पृथ्वी और श्रोत्र पर दृष्टि स्थिर करने के लिए उड़द के बराबर लक्ष्य का अनुसंधान करने को कहा गया है। वह बिन्दु सम्भवतः नासिका-मूल और कर्ण-मूलों के मध्य मस्तिष्क में स्थित होता है, जहाँ गन्ध और शब्द का अनुभव करने वाले संवेदन-कोष (सेंसिंग सेल) स्थित होते हैं। वहाँ अन्तर्दृष्टि को केन्द्रित करने से नासिका-रन्ध्रों से प्रवेश करने वाली गन्ध तथा कर्णरन्ध्रों से प्रवेश करने वाले शब्द अन्तःक्षेत्र की तन्मात्राओं में स्थापित नहीं हो पाते। इस प्रकार बहिर्जगत् से सभी तन्मात्राओं को असम्बद्ध करके ही अन्तःस्थित ब्राह्मी चेतना की प्रभावी अनुभूति सम्भव होती है।)
जो ब्रह्म का चिन्तन करता है, वह स्वयं ब्रह्मरूप हो जाता है और यही शिव है। उस (अविनाशी ब्रह्म) को पूर्वजन्म में किए हुए पुण्य कर्मों के फलस्वरूप अभ्यास के द्वारा ही प्राप्त किया जाता है।
वायु के नाद का प्रकट होना ही हृदय का तप कहा जाता है। वह शरीर को भेदकर ऊर्जा की ओर गमन करता हुआ मूर्धा को प्राप्त कर लेता है। (—सामान्य जीवन में पृथ्वी तत्त्व के संचरण से गन्ध उत्पन्न होती है। गन्ध की अनुभूति से जल-रस सक्रिय होकर स्वाद को उत्तेजित करता है। रस की उत्तेजना से अग्नि (जठराग्नि) में तीव्रता आती है। अग्नि की तीव्रता से शरीरस्थ वायु-प्राण का संचरण तीव्र होता है। प्राण की गतिशीलता से विविध सांसारिक सुखोपभोगों की क्षमता का विकास होता है। योगस्थ अवस्था में तन्मात्राओं को रुद्ध करके उनकी बाह्य सुखानुभूति-परक सक्रियता को घटाया जाता है और उन्हें अन्तःआनन्द की ओर उन्मुख किया जाता है। ऐसी स्थिति में शरीरस्थ वायु-प्राण के गतिशील होने पर अक्षर अनाहत नाद की अनुभूति होती है। यह नाद मूर्धास्थित सहस्रार एवं ब्रह्मरन्ध्र को सक्रिय करके परमगति का मार्ग खोलने में समर्थ होता है।)
अपने इस शरीर में मूर्धा को प्राप्त कर लेना ही परमगति कहा गया है। जो मनुष्य इस गति को प्राप्त कर लेते हैं, वे ब्रह्मज्ञानी आवागमन के चक्र से मुक्त हो जाते हैं।
विकाररहित और उदासीन भावयुक्त साक्षी को साक्ष्य-धर्म वैसे ही स्पर्श नहीं कर सकता, जिस प्रकार गृह-धर्म प्रज्वलित दीप पर कोई भी प्रभाव नहीं डाल सकता। (दीपक के प्रकाश में ही गृही (घर में रहने वाला) अपने विभिन्न धर्म-कर्त्तव्यों को सम्पन्न करता है; किन्तु दीपक उन सबसे अप्रभावित रहता है। उसी प्रकार योगी की चेतना उसकी काया द्वारा विविध कर्म किए जाने की स्थिति तो उत्पन्न करती है, किन्तु स्वयं उनसे अप्रभावित रहती है।)
यह जड़ात्मक शरीर चाहे जल-राशि में पड़ा रहे अथवा स्थल (जल से रहित भूमि) पर पड़ा रहे, मैं (जीवात्मा), जो स्वयं चैतन्यस्वरूप हूँ, उसमें किसी भी प्रकार से लिप्त नहीं हो सकता। जैसे घड़े के कारण घटाकाश में किसी भी प्रकार की विकृति उत्पन्न नहीं होती।
मैं तो निष्क्रिय, विकाररहित, निष्कल, आकृतिरहित, निर्विकल्प, अनित्य, निरालम्ब, अद्वैत, सर्वात्मा, सर्वातीत एवं द्वयरहित हूँ।
मैं केवल अखण्ड बोधस्वरूप हूँ तथा निरन्तर स्वयं आनन्दमय हूँ।
मैं स्वयं को ही सतत देखता हूँ, स्वयं को ही अद्वैतस्वरूप मानते हुए, स्वयं के आनन्द का उपभोग करता हुआ, मैं स्वयं ही निर्विकल्प स्वरूप हूँ।
सतत चलता हुआ, रुका हुआ, बैठा हुआ, सोता हुआ अथवा कुछ भी करता हुआ, वह विद्वान् मुनि रूप आत्मा अपने में ही सन्तुष्ट होकर अपनी इच्छानुसार जीवन-यापन करे—यही इस उपनिषद् का उपदेश है।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें