सह तेनैव पुरुषः कथं संन्यस्त उच्यते। सनामधेयो यस्मिस्तु कथं संन्यस्त उच्यते ॥
परन्तु इतने सामान्य से कर्म के करने मात्र से कोई भी व्यक्ति संन्यासी नहीं कहा जा सकता है। यह तो साधारण नियम का पालन है, संन्यासी के नियम इससे कहीं अधिक श्रेष्ठ कहे गये हैं।
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