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कुण्डीक • अध्याय 1 • श्लोक 7
लोकवद्भार्ययाऽऽसक्तो वनं गच्छति संयतः । संत्यक्त्वा संसृतिसुखमनुतिष्ठति किं मुधा ॥
साधारण लोगों की तरह स्त्री एवं सांसारिक सुखों का परित्याग कर वन में गमन करके अनुष्ठान आदि करने से क्या लाभ है?
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