यह जड़ात्मक शरीर चाहे जल-राशि में पड़ा रहे अथवा स्थल(जल से रहित भूमि) पर पड़ा रहे, मैं (जीवात्मा), जो स्वयं चैतन्यस्वरूप हूँ, उसमें किसी भी प्रकार से लिप्त नहीं हो सकता।
जैसे घड़े के कारण घटाकाश में किसी भी प्रकार की विकृति उत्पन्न नहीं होती।
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