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कुण्डीक • अध्याय 1 • श्लोक 24
जले वापि स्थले वापि लुठत्वेष जडात्मकः । नाहं विलिप्ये तद्धमैर्घटधमैर्नभो यथा ॥
यह जड़ात्मक शरीर चाहे जल-राशि में पड़ा रहे अथवा स्थल अर्थात् जल से रहित भूमि पर पड़ा रहे, मैं (जीवात्मा) जो स्वयं चैतन्य रूप हूँ, इस कारण से उसमें लिप्त नहीं हो सकता। जैसे घड़े के कारण घटाकाश में किसी भी तरह की विकृति नहीं आने पाती।
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