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कुण्डीक • अध्याय 1 • श्लोक 6
तस्मात्फलविशुद्धाङ्गी संन्यासं संहितात्मनाम्। अग्निवर्णं विनिष्क्रम्य वानप्रस्थं प्रपद्यते ॥
इसके लिए फल की इच्छा न रखते हुए संन्यास-धर्म के अनुसार मुक्ति की साधना करनी चाहिए तथा वर्णाश्रम-व्यवस्था एवं अग्नि का परित्याग करके वानप्रस्थ आश्रम में प्रवेश करना चाहिए।
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