न मे देहेन संबन्धो मेघेनेव विहायसः । अतः कुतो मे तद्धर्मा जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तिषु ॥
मेरा इस शरीर से उसी प्रकार का कोई सम्बन्ध नहीं है, जैसे आकाश का मेघ से कोई सम्बन्ध नहीं होता।
अतः इस शरीर की जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति आदि अवस्थाओं से मेरा (जीवात्मा का) क्या सम्बन्ध है?
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