भिक्षादिवैदलं पात्रं स्नानद्रव्यमवारितम्। एवं वृत्तिमुपासीनो यतेन्द्रियो जपेत्सदा ॥
भिक्षा के लिए पात्र तथा स्नान आदि के लिए जल जिस किसी भी प्रकार से उपलब्ध हो, उसी को ग्रहण करना चाहिए।
इस प्रकार अनुपम एवं श्रेष्ठ आचरण को स्वीकार करके यति को सदा जप करते रहना चाहिए।
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