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कुण्डीक • अध्याय 1 • श्लोक 16
आकाशवत्कल्पविदूरगोऽहमादित्यवद्भास्यविलक्षणोऽहम्। अहार्यवन्नित्यविनिश्चलो ऽहमम्भोधिवत्पारविवर्जितोऽहम् ॥
मैं (जीवात्मा) आकाश की भाँति कल्पना से परे हूँ, सूर्य के सदृश अन्य सुनहले आकर्षक पदार्थों से पृथक् हूँ, पर्वत की भाँति सदा स्थिर रहता हूँ तथा समुद्र की तरह अपार हूँ।
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