मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
कुण्डीक • अध्याय 1 • श्लोक 20
अथ शैवपदं यत्र तद्ब्रह्म ब्रह्म तत्परम्। तदभ्यासेन लभ्येत पूर्वजन्मार्जितात्मनाम् ॥
जो ब्रह्म का चिन्तन करता है, वह स्वयं ब्रह्मरूप हो जाता है और यही शिव है। उस (अविनाशी ब्रह्म) को पूर्वजन्म में किए हुए पुण्य कर्मों के फलस्वरूप अभ्यास के द्वारा ही प्राप्त किया जाता है।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
कुण्डीक के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

कुण्डीक के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें