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कुण्डीक • अध्याय 1 • श्लोक 11
नदीपुलिनशायी स्याद्देवागारेषु बाह्यतः । नात्यर्थं सुखदुःखाभ्यां शरीरमुपतापयेत् ॥
(वह यदि) चाहे तो अपनी इच्छानुसार नदी के तट पर शयन करे। बिना कोई विशेष कारण के शरीर को सुख-दुःखादि द्वारा कष्ट नहीं देना चाहिए।
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