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कुण्डीक • अध्याय 1 • श्लोक 2
दारमाहृत्य सदृशमग्निमाधाय शक्तितः । ब्राह्मीमिष्टिं यजेत्तासामहोरात्रेण निर्वपेत् ॥
बुद्धिमान् मनुष्य को चाहिए कि वह अपने अनुकूल स्त्री को स्वीकार करे तथा अपनी शक्ति के अनुसार अग्नि को ग्रहण करके ब्रह्मयज्ञ में संलग्न रहकर अपना जीवन-यापन करे।
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