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कुण्डीक • अध्याय 1 • श्लोक 28
गच्छंस्तिष्ठन्नुपविशञ्छयानो वाऽन्यथापि वा। यथेच्छया वसेद्विद्वानात्मारामः सदा मुनिरित्युपनिषत् ॥ ॐ आप्यायन्तु इति शान्तिः ॥ ॥ इति कुण्डिकोपनिषत्समाप्ता ॥
सतत चलता हुआ, रुका हुआ, बैठा हुआ, सोता हुआ अथवा कुछ भी करता हुआ, वह विद्वान् मुनि रूप आत्मा अपने में ही सन्तुष्ट होकर अपनी इच्छानुसार जीवन-यापन करे—यही इस उपनिषद् का उपदेश है।
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