सतत चलता हुआ, रुका हुआ, बैठा हुआ, सोता हुआ अथवा कुछ भी करता हुआ, वह विद्वान् मुनि रूप आत्मा अपने में ही सन्तुष्ट होकर अपनी इच्छानुसार जीवन-यापन करे—यही इस उपनिषद् का उपदेश है।
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