सुधीजनों को अपने मन में यह भावना करनी चाहिए कि यह विश्वरूप ब्रह्म और मनु, अर्थात् प्रणवरूप अक्षरब्रह्म, दोनों एक ही हैं।
आकाश से वायु, वायु से ज्योति(अग्नि), ज्योति से जल और जल से पृथ्वी—इन सभी भूतों में जो अविनाशी ब्रह्म सर्वत्र व्याप्त है, ऐसे उस (ब्रह्म) को मैं प्राप्त हुआ हूँ।
मैं अजर, अमर, अक्षर और अव्यय को (मैं) प्राप्त हुआ हूँ।
मैं अखण्ड सुख-सागर स्वरूप हूँ।
मेरे भीतर अनेक लहरेंमायारूपी वायु के द्वारा प्रादुर्भूत होती हैं और उसी में विलीन हो जाती हैं।
(यहाँ ब्राह्मी चेतना के सूक्ष्म से स्थूल में क्रमशः अवतरण का ध्यान बताया गया है। आगे इसी चेतना के स्थूल से सूक्ष्म में आरोहण की साधना पर भी प्रकाश डाला गया है।)
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