स्त्रानं पानं तथा शौचमद्भिः पूताभिराचरेत्। स्तूयमानो न तुष्येत निन्दितो न शपेत्परान् ॥
स्नान के लिए, पीने के लिए तथा शौचादि के लिए शुद्ध जल का सेवन करना चाहिए। वह न तो स्तुति-प्रशंसा आदि से प्रसन्न हो और न ही निन्दा-अपमान होने पर किसी को शाप आदि ही दे।
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