मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
कुण्डीक • अध्याय 1 • श्लोक 23
न साक्षिणं साक्ष्यधर्माः संस्पृशन्ति विलक्षणम्। अविकारमुदासीनं गृहधर्माः प्रदीपवत् ॥
विकाररहित और उदासीन भावयुक्त साक्षी को साक्ष्य-धर्म वैसे ही स्पर्श नहीं कर सकता, जिस प्रकार गृह-धर्म प्रज्वलित दीप पर कोई भी प्रभाव नहीं डाल सकता। (दीपक के प्रकाश में ही गृही (घर में रहने वाला) अपने विभिन्न धर्म-कर्त्तव्यों को सम्पन्न करता है; किन्तु दीपक उन सबसे अप्रभावित रहता है। उसी प्रकार योगी की चेतना उसकी काया द्वारा विविध कर्म किए जाने की स्थिति तो उत्पन्न करती है, किन्तु स्वयं उनसे अप्रभावित रहती है।)
पूरा ग्रंथ पढ़ें
कुण्डीक के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

कुण्डीक के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें