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कुण्डीक • अध्याय 1 • श्लोक 4
वायुभक्षोऽम्बुभक्षो वा विहितैः कन्दमूलकैः । स्वशरीरे समाप्याथ पृथिव्यां नाश्रु पातयेत् ।।
संन्यासी को वायु अथवा जल सेवन करके अथवा विहित (शास्त्रानुमोदित) कन्द-मूल आदि से सतत अपने शरीर की रक्षा करनी चाहिए। साथ ही (संसार को) शरीर तक सीमित मानकर (मोह-ममतावश) अनुपात नहीं करना चाहिए।
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