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कुण्डीक • अध्याय 1 • श्लोक 19
माषमात्रां तथा दृष्टिं श्रोत्रे स्थाप्य तथा भुवि। श्रवणे नासिके गन्धा यतः स्वं न च संश्रयेत् ॥
माष मात्र (उड़द के बराबर) लक्ष्य को अनुसंधान करके दृष्टि को श्रोत्र और पृथ्वी पर स्थिर करें। जिससे श्रवण (शब्द) और नासिका में गन्ध न स्थापित हो सके। - आगे के मंत्र क्र० २०,२१, २२ में सभी तन्मात्राओं को रुद्ध करके हृदय के तप से उत्पन्न नाद के माध्यम से आत्म-चेतना को ब्राह्मी चेतना के साथ संयुक्त करने की साधना का संकेत है। उसके लिए देहस्थ सभी तन्मात्राओं को संयमित करने की स्वानुभूत प्रक्रिया का संकेत ऋषि ने मंत्र क्र० १८,१९ में किया है। इसमें स्थूल और सूक्ष्म क्रियाओं का संयोग है। शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध इन पाँचों तन्मात्राओं को बाहरी संवेदना से असम्बद्ध करके ही अन्तः अनुभूति में उतरा जा सकता है। ध्यान में नेत्र बन्द करने से अग्नि की तन्मात्रा 'रूप' के बाह्य संकेत बद्ध हो जाते हैं। मंत्र १८ के अनुसार-संयम, धारणा, ध्यान, समाधि से स्पर्श एवं रस की तन्मात्राएँ अन्तर्मुखी होती हैं। मंत्र १९ में पृथ्वी और ओत्र पर दृष्टि स्थिर करने के लिए उड़द के बराबर लक्ष्य का अनुसंधान करने को कहा गया है। वह बिन्दु कहीं नासिका मूल और कर्णमूलों के मध्य मस्तिष्क में ही हो सकता है, जहाँ गंध और शब्द का अनुभव करने वाले संवेदन कोष (सैसिग सैल) स्थित हों, वहाँ अन्तः दृष्टि ध्यान केन्द्रित करने से नासिकारंधों में प्रवेश करने वाली गंध तथा कर्णरों से प्रवेश करने वाले शब्द-अन्तःक्षेत्र की तन्मात्राओं में स्थापित नहीं हो सकते। इस प्रकार बहिर्जगत् से सभी तन्मात्राओं को असम्बद्ध करके ही अन्तःस्थिति-ब्राह्मी चेतना की प्रभावी अनुभूति संभव होती है।
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