वायु के नाद का प्रकट होना ही हृदय का तप कहा जाता है। वह शरीर को भेदकर ऊर्जा की ओर गमन करता हुआ मूर्धा को प्राप्त कर लेता है।
(—सामान्य जीवन में पृथ्वी तत्त्व के संचरण से गन्ध उत्पन्न होती है। गन्ध की अनुभूति से जल-रस सक्रिय होकर स्वाद को उत्तेजित करता है। रस की उत्तेजना से अग्नि(जठराग्नि) में तीव्रता आती है। अग्नि की तीव्रता से शरीरस्थ वायु-प्राण का संचरण तीव्र होता है। प्राण की गतिशीलता से विविध सांसारिक सुखोपभोगों की क्षमता का विकास होता है। योगस्थ अवस्था में तन्मात्राओं को रुद्ध करके उनकी बाह्य सुखानुभूति-परक सक्रियता को घटाया जाता है और उन्हें अन्तःआनन्द की ओर उन्मुख किया जाता है। ऐसी स्थिति में शरीरस्थ वायु-प्राण के गतिशील होने पर अक्षर अनाहत नाद की अनुभूति होती है। यह नादमूर्धास्थित सहस्रार एवं ब्रह्मरन्ध्र को सक्रिय करके परमगति का मार्ग खोलने में समर्थ होता है।)
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