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कुण्डीक • अध्याय 1 • श्लोक 18
तदभ्यासेन प्राणापानौ संयम्य तन्त्र भोका भवन्ति । वृषणापानयोर्मध्ये पाणी आस्थाय संश्रयेत्। संदश्य शनकैर्जिह्वां यवमात्रे विनिर्गताम् ॥
अब प्राण एवं अपान के अभ्यास के विषय में वर्णन करते हैं। वृषण तथा गुदा के बीच में दोनों हाथों को रखें। दाँतों से जिह्वा को शनैः शनैः दबाते हुए एक जौ के बराबर बाहर निकालें।
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