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कुण्डीक • अध्याय 1 • श्लोक 27
स्वमेव सर्वतः पश्यन्मन्यमानः स्वमद्वयम् । स्वानन्दमनुभुञ्जानो निर्विकल्पो भवाम्यहम् ॥
मैं स्वयं को ही सतत देखता हूँ, स्वयं को ही अद्वैत रूप में मानता हुआ, स्वयं के आनन्द का उपभोग करता हुआ, मैं स्वयं ही निर्विकल्प रूप हूँ।
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