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अध्याय 4 — कैवल्य पाद
योगसूत्र
34 श्लोक • केवल अनुवाद
जन्म से, औषधियों एवं रसायनों के सेवन से, गायत्री आदि शक्तिशाली मंत्रों के जप से, तप करने से और धारणा, ध्यान एवं समाधि के अभ्यास से योगी में अनेक सिद्धियाँ उत्पन्न होती हैं।
शरीर एवं इन्द्रियों का भिन्न जाति में परिवर्तन प्रकृति
(उपादान कारण)
के आपूरण से संभव होता है।
धर्म, क्रिया योग आदि जो निमित्त साधन होते हैं वे उपादान कारण-प्रकृति के प्रेरक या संचालक नहीं होते हैं, अपितु किसान के समान अवरोध को दूर करते हैं। प्रकृति अपने स्वभाव से ही जात्यन्तर रूपी परिणाम में परिवर्तित होती है।
योगी जब अनेक शरीरों का निर्माण करता है तब वह अस्मिता
(संकल्प मात्र)
का प्रयोग करके अनेक चित्त निर्मित कर लेता है।
योगी द्वारा निर्मित अनेक चित्तों में अलग-अलग क्रियाओं अथवा वृत्तियों का संचालन करने वाला वह चित्त एक ही होता है।
समाधि के द्वारा अनेक चित्त निर्मित होने के कारण ये चित्त कर्म-संस्कारों से रहित होते हैं अर्थात पाप-पुण्य आदि कर्मों का संस्कार नहीं बनता है।
योगी के कर्म पाप एवं पुण्य से रहित होते हैं अर्थात निष्काम होते हैं जबकि योगी से भिन्न सांसारिक व्यक्तियों के कर्म तीन प्रकार के होते हैं। योगियों से दूसरे व्यक्तियों के अलग से तीन प्रकार के कार्य होते हैं।
योगी से भिन्न व्यक्ति के अन्य तीन प्रकार के कार्य होते हैं, उन फलोन्मुख कर्मों के भोगों के अनुरूप ही वासनाओं या संस्कारों की अभिव्यक्ति होती है।
स्मृति और संस्कार की एकरूपता होने के कारण जाति, स्थान, व काल से बाधित होने पर भी वासनाएं प्रकट हो जाती हैं।
जिजीविषा अर्थात जीवित रहने की इच्छा की सतत विद्यमानता होने से उन वासनाओं या संस्कारों का प्रवाह अनादिकाल से ही निरन्तर चलता रहता है।
हेतु, फल, आश्रय व आलम्बन से ही वासनाओं का संग्रह होता है। अतः इन उपर्युक्त चार कारणों का अभाव होने से सभी वासनाओं का भी अभाव हो जाता है ।
पदार्थों के धर्मों में भेद होने से जिन पदार्थों का काल बीत चुका है और जिन पदार्थो का अभी समय नहीं आया है वे सभी पदार्थ स्वरुप से अस्तित्व में होते ही हैं।
तीनों कालों में विद्यमान रहने वाले सभी पदार्थ व्यक्त या प्रकट एवं सूक्ष्म रूप से अप्रत्यक्ष गुण रूप से अस्तित्व में रहते हैं।
त्रिगुणों का एक रूप में परिणाम होने से वस्तु या पदार्थ में एकत्व होता है।
वस्तु के एक समान होने पर भी अनेक चित्तों में ज्ञान का अन्तर होने से उन दोनों अर्थात वस्तु और उसके ज्ञान के मार्ग अलग अलग होते हैं।
कोई भी वस्तु किसी भी एक ही चित्त के द्वारा अधीनस्थ या नियंत्रित नहीं होती है, क्योंकि जब उस चित्त का अस्तित्व नहीं रहेगा तब उस वस्तु होगी या नहीं होगी?
चित्त को वस्तु का ज्ञान होना एवं न होना वस्तु के साथ उपराग की अपेक्षा से होता है।
ऐसे चित्त के स्वामी जीवात्मा के अपरिणामी या अपरिवर्तनशील होने से उसे चित्त की सभी वृत्तियाँ सदैव ज्ञात रहती हैं।
वह चित्त दृश्य होने अथवा प्रकृति से निर्मित होने के कारण ज्ञेय है अर्थात ज्ञाता नहीं है।
और इस प्रकार एक ही समय में एक साथ चित्त व विषय दोनों का बोध या ज्ञान नहीं हो सकता है।
एक चित्त का दूसरे चित्त से ज्ञान हो जायेगा ऐसा मानने पर दूसरी बुद्धि के कारण उसमें अनवस्था दोष उत्पन्न होता है। तथा सभी स्मृतियों के परस्पर घुल मिल जाने का दोष उत्पन्न हो जायेगा।
पुरुष का विषयों के साथ सीधा सम्बन्ध न होकर के, विषयों के साथ तादात्म्य हुए चित्त का ज्ञान होता है।
चित्त का आत्मा-दृष्टा व विषय के साथ सम्बन्ध हो जाने से वह सभी प्रयोजन
(भोग एवं अपवर्ग)
कि सिद्धि करने वाला हो जाता है।
वह चित्त अनंत या अनगिनत वासनाओं से चित्रित होने पर भी जीवात्मा के है, क्योंकि संघात स्वभाव होने से वह दूसरों के लिए प्रयोजन सिद्ध करने वाला होता है।
ऐसे योगी जिन्हें विशेष ज्ञान प्राप्त हो जाता है, उन्हें स्वयं को जानने की इच्छा की समाप्ति हो जाती है।
जब योगी विवेकज्ञान की प्राप्ति कर लेता है तब उसका चित्त विवेक ज्ञान के मार्ग पर निरंतर लगा हुआ कैवल्य की ओर अभिमुख हो जाता है।
विवेकज्ञान होने के बाद भी बीच बीच में पूर्व जन्म के संचित और बचे हुए संस्कारों के कारण व्युत्थान की स्थिति विवेकज्ञान के साथ आती रहती है।
इन सभी पूर्व जन्म के संचित और बचे संस्कारों का नाश भी पूर्व पाद में वर्णित अविद्या आदि पञ्च क्लेशों के समान समझना चाहिए।
विवेक ज्ञान से उत्पन्न सिद्धियों से अनासक्त हो जाने पर सर्वथा विवेक ख्याति होने से धर्ममेघ नामक समाधि की प्राप्ति होती है।
उस धर्ममेघ नामक समाधि के प्राप्त होने से क्लेश मूलक कर्म समुदायों समाप्ति हो जाती है।
धर्ममेघ समाधि के द्वारा क्लेशों की समाप्ति होने पर विशुद्ध ज्ञान अविद्या आदि आवरण और क्लेश रूपी मल से रहित हो जाता है और उस विशुद्ध ज्ञान की ज्ञान के अनंतता से फिर जानने योग्य अत्यंत अल्प बच जाता है।
धर्ममेघ समाधि के बाद अपने भोग व अपवर्ग रूपी प्रयोजन को सिद्ध कर चुके गुणों का परिणाम क्रम भी समाप्त हो जाता है।
क्षण के अभाव पूर्वक कार्य के समाप्ति पर्यन्त जो ज्ञात होता है उसे ‘क्रम’ कहते हैं।
इस जीवन के प्रयोजन अथवा लक्ष्य से रहित हुए गुणों का वापिस अपने कारण में लीन हो जाना ही कैवल्य मुक्ति होता है। आत्मा का अपने वास्तविक स्वरूप में स्थित हो जाना ही मोक्ष कहलाता है।
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