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योगसूत्र • अध्याय 4 • श्लोक 22
चितेरप्रतिसंक्रमायास्तदाकारापत्तौ‌ ‌स्वबुद्धिसंवेदनम्‌ ‌॥ ‌ चिते: अप्रतिसंक्रमाया:‌ तदाकार-आपत्तौ, स्वबुद्धि-संवेदनम् ॥
पुरुष का विषयों के साथ सीधा सम्बन्ध न होकर के , विषयों के साथ तादात्म्य हुए चित्त का ज्ञान होता है।
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