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योगसूत्र • अध्याय 4 • श्लोक 31
‌तदा‌ ‌सर्वावरणमलापेतस्य‌ ‌ज्ञानस्यानन्त्याज्ज्ञेयमल्पम्‌ ‌॥ ‌ तदा, सर्व-आवरण-मल-अपेतस्य, ज्ञानस्य-आनन्त्यात्-ज्ञेयम्-अल्पम्॥
धर्ममेघ समाधि के द्वारा क्लेशों की समाप्ति होने पर विशुद्ध ज्ञान अविद्या आदि आवरण और क्लेश रूपी मल से रहित हो जाता है और उस विशुद्ध ज्ञान की ज्ञान के अनंतता से फिर जानने योग्य अत्यंत अल्प बच जाता है ।
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