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योगसूत्र • अध्याय 4 • श्लोक 3
निमित्तमप्रयोजकं‌ ‌प्रकृतीनां‌ ‌वरणभे‌दस्तु ‌ततः‌ ‌क्षेत्रिकवत्‌ ॥ निमित्त , प्रयोजकं‌ , प्रकृतीनां‌ , वरणभेदस:, ततः‌, क्षेत्रिकवत्‌॥
धर्म, क्रिया योग आदि जो निमित्त साधन होते हैं वे उपादान कारण-प्रकृति के प्रेरक या संचालक नहीं होते हैं, अपितु किसान के समान अवरोध को दूर करते हैं । प्रकृति अपने स्वभाव से ही जात्यन्तर रूपी परिणाम में परिवर्तित होती है।
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