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योगसूत्र • अध्याय 4 • श्लोक 18
सदा‌ ‌ज्ञाताश्चित्तवृत्तयस्तत्प्रभोः‌ ‌पुरुषस्यापरिणामित्वात्‌ ‌॥ ‌ ‌सदा, ज्ञाता:, चित्तवृत्तय:,तत् , प्रभो:, पुरुषस्य, अपरिणामित्वात् ॥
ऐसे चित्त के स्वामी जीवात्मा के अपरिणामी या अपरिवर्तनशील होने से उसे चित्त की सभी वृत्तियाँ सदैव ज्ञात रहती हैं ।
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