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योगसूत्र • अध्याय 4 • श्लोक 5
प्रवृत्तिभेदे‌ ‌प्रयोजकं‌ ‌चित्तमेकमनेकेषाम्‌ ‌॥ प्रवृत्तिभेदे,प्रयोजकम् , चित्तम्-एकम्-अनेकेषाम् ॥
योगी द्वारा निर्मित अनेक चित्तों में अलग-अलग क्रियाओं अथवा वृत्तियों का संचालन करने वाला वह चित्त एक ही होता है ।
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