मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें

अध्याय 1 — समाधि पाद

योगसूत्र
51 श्लोक • केवल अनुवाद
अब योग के अनुसाशन को प्रांरम्भ करते हैं ।
चित्त अर्थात् अन्त:करण की वृत्तियों का निरोध सर्वथा रुक जाना योग है ।
उस समय (निरोध के अवस्था में) द्रष्टा की अपने ही रूप अर्थात् चेतन-मात्र में स्थिति हो जाती है ।
दूसरे समय में अर्थात् वृत्तियों के निरोध से भिन्न अवस्था में द्रष्टा का वृत्ति के सदृश स्वरूप होता है ।
उपर्युक्त वृत्तियाँ पाँच प्रकार की होती हैं - क्लेशयुक्त और क्लेशशून्य भेदों वाली ।
वे हैं - प्रमाण विपर्यय विकल्प निद्रा और स्मृति ।
प्रत्यक्ष , अप्रत्यक्ष पदार्थ का ज्ञान और वेद, शास्त्र तथा आप्त-पुरुष के वचन - ये तीन प्रमाण वृत्तियाँ हैं ।
विपर्यय का अर्थ है मिथ्या ज्ञान जो उस वस्तु के स्वरूप में प्रतिष्ठित नहीं है ।
जो ज्ञान शब्दजनित ज्ञान के साथ-साथ होनेवाला है; और वस्तु की सत्ता से शून्य हो, वह विकल्प अर्थात कल्पना है ।
अभाव के ज्ञान की प्रतीति को अवलम्बन (ग्रहण) करने वाली वृत्ति को निद्रा अर्थात सुषुप्ति कहते हैं।
प्रमाण, विपर्यय, विकल्प और निद्रा के अनुभव किए हुए विषय का न छिपना अर्थात संस्कारवश उनका ज्ञान के स्तर पर प्रकट हो जाना स्मृति कहलाता है।
अभ्यास - अभ्यास और वैराग्य से उन चित्तवृत्तियों का निरोध होता है।
उन दोनों - अभ्यास और वैराग्य, में से चित्तकी स्थिरता के लिए जो प्रयत्न करना है, वह अभ्यास है।
परन्तु बहुत समय तक निरन्तर और श्रद्धा के साथ सेवन किया हुआ वह अभ्यास दृढ़ अवस्था वाला हो जाता है।
देखे हुए और सुने हुए विषयों में सर्वथा तृष्णारहित है, उसका वैराग्य अपर-वैराग्य नाम वाला है।
पुरुष के असल स्वरूप के ज्ञान से जो प्रकृति के गुणों में तृष्णा रहित हो जाना है - वह पर-वैराग्य है।
वितर्क, विचार, आनंद और अस्मिता - इन चारों के सम्बन्ध से युक्त चित्तवृत्ति का समाधान - सम्प्रज्ञात समाधि है।
विराम-प्रत्यय का अभ्यास जिसकी पूर्व-अवस्था है और जिसमें चित्त का स्वरूप 'संस्कार' मात्र ही शेष रह जाता है, वह योग अन्य है अर्थात् असम्प्रज्ञात समाधि है ।
विदेह और प्रकृतिलाय योगियों का उपर्युक्त योग भव प्रत्यय कहलाता है।
दूसरे साधकों को श्रद्धा, वीर्य अर्थात् मन का तेज, स्मृति, समाधि और प्रज्ञा अर्थात् सत्य वस्तु के विवेक से - असम्प्रज्ञात समाधि प्राप्त होती है।
जिनकी साधन की गति तीव्र है, उनकी निर्बीज-समाधि शीघ्र सिद्ध होती है ।
साधन की मात्रा हलकी, मध्यम और उच्च मात्रा के अनुसार तीव्र संवेगवालों में भी काल का भेद हो जाता है ।
ईश्वर के प्रति भक्ति से भी निर्बीज-समाधि की सिद्धि शीघ्र हो सकती है ।
क्लेश, कर्म, विपाक, आशय - इन चारों के संबंध से रहित है तथा जो समस्त पुरुषों से उत्तम है, वह ईश्वर है ।
उस ईश्वर में सर्वज्ञत्व का बीज अर्थात् ज्ञान निरतिशय है ।
वह ईश्वर पूर्व उत्पन्न गुरुगणों का भी गुरु है, क्योंकि वह काल से सीमित नहीं है अर्थात् सर्वकाल में विद्यमान है ।
उस ईश्वर का वाचक (नाम) प्रणव अर्थात् ॐ कार है ।
उस ॐ कार का जप और उस ईश्वर के अर्थस्वरूप का ध्यान करना अर्थात् पुनः पुन: चिन्तन करना चाहिए ।
उस ईश्वर प्रणिधान से विध्नों का अभाव और अन्तरात्मा के स्वरूप की प्राप्ति अर्थात् साक्षात्कार भी हो जाता है।
व्याधि (रोग), मानसिक जड़ता, संदेह, प्रमाद, आलस्य, विषयतृष्णा, मिथ्या अनुभव, समाधि नहीं लग पाना , समाधि लाभ होने पर भी अधिक देर समाधि में नहीं ठहर पाना - ये चित्त के नौ क्षोभ या योग के मूल विघ्न हैं ।
दुख, मन खराब होना, अंगमेजयत्व, श्वास और प्रश्वास - ये पाँच विघ्न विक्षेपों के साथ-साथ होनेवाले हैं।
उन विक्षेपों को दूर करने के लिए एक तत्त्व का अभ्यास करना चाहिए ।
सुखी, दु:खी, पुण्यात्मा और पापात्मा के विषयों में क्रमशः मित्रता, दया, आनंद और उपेक्षा की भावना से चित्त प्रसन्न और स्वच्छ होता है ।
प्राणवायुको बारम्बार बाहर निकालने और रोकने से भी चित्त स्थिर होता है ।
विषयवाली प्रवृत्ति उत्पन्न होकर वह भी मन की स्थिति को बाँधने वाली होती है ।
ज्योतिष्मति प्रवृत्ति (भी मन की स्थिति को बाँधने वाली होती है) ।
राग रहित विषयवाला महापुरुषों का चित्त (मन की स्थिति को बाँधने वाला होता है) ।
स्वप्न और निद्रा के ज्ञान का अवलम्बन करनेवाला चित्त भी स्थिर हो सकता है ।
जिसको जो अभिमत हो, उसके ध्यान से; भी मन स्थिर हो जाता है ।
(पूर्वोक्त उपायों में स्थिर हुए चित्त) का परमाणु से लेकर परम वृहत् पदार्थों में वशीकार हो जाता है ।
भावार्थः जिसकी समस्त बाह्य वृत्तियाँ क्षीण हो चुकी हैं, ऐसे स्फटिक मणि की भाँति निर्मल चित्त का; जो ग्रहीता अर्थात् आत्मा ग्रहण अर्थात् अंत:करण और इंद्रियां तथा ग्राह्य अर्थात् पंचभूत और विषयों - में एकाग्र स्थित होकर उसी विषय के स्वरूप को प्राप्त हो जाना सम्प्रज्ञात समाधि अर्थात् चित्त का विषय के साथ तदाकार हो जाना है ।
उन समापत्तियों में शब्द, अर्थ, ज्ञान - इन तीनों के विकल्पों से मिली हुई समापत्ति अर्थात् समाधि सवितर्क अर्थात् वितर्कयुक्त कहलाती है ।
स्मृति के शुद्ध अर्थात् आगम और अनुमान के शब्द और ज्ञान से रहित हो जाने पर अपने रूप से शून्य हुई जैसी केवल ध्येय अर्थ मात्र के स्वरूप को प्रत्यक्ष कराने वाली चित्त की स्थिति ही; निर्वितर्क समाधि है ।
इन अर्थात् पूवोक्त सवितर्क और निर्वितर्क समाधियों के वर्णन से ही सूक्ष्म विषयों में की जानेवाली सविचार और निर्विचार समाधि का भी वर्णन कर दिया गया है ।
सूक्ष्म विषयता प्रकृति पर्यन्त है ।
ये पूर्वोक्त सभी ही सबीज समाधि हैं ।
निर्विचार समाधि की निर्मल होने पर अध्यात्म प्रसाद प्राप्त होता है अर्थात् चित्त की स्थिति दृढ़ हो जाती है।
उस अध्यात्म-प्रसाद से बुद्धि ऋतम्भरा होती है ।
श्रवण और अनुमान से होने वाली बुद्धि से ऋतम्भरा प्रज्ञा का विषय भिन्न है, क्योंकि यह विशेष रूप से अर्थ को साक्षात्कार करने के सन्दर्भ में है ।
उस (ऋतंभरा-प्रज्ञा) से उत्पन्न होने वाला संस्कार दूसरे संस्कारों को रोकने वाला होता है ।
उस (ऋतंभरा प्रज्ञा जन्य संस्कार) के भी निरोध हो जाने पर सबका निरोध हो जाने के कारण निर्बीज समाधि हो जाती है ।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें