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योगसूत्र • अध्याय 1 • श्लोक 4
वृत्तिसारूप्यम् इतरत्र ॥ वृत्ति , सारूप्यम् , इतरत्र ॥
दूसरे समय में अर्थात् वृत्तियों के निरोध से भिन्न अवस्था में द्रष्टा का वृत्ति के सदृश स्वरूप होता है ।
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