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योगसूत्र • अध्याय 1 • श्लोक 41
क्षीणवृत्तेरभिजातस्येव मणेर्ग्रहीतृग्रहणग्राह्येषु तत्स्थतदञ्जनतासमापत्तिः॥ क्षीण , वृत्ते: , अभिजातस्य , इव , मणे: , ग्रहीतृ , ग्रहण , ग्राह्येषु , तत्स्थ , तदञ्जनता , समापत्तिः ॥
भावार्थः जिसकी समस्त बाह्य वृत्तियाँ क्षीण हो चुकी हैं, ऐसे स्फटिक मणि की भाँति निर्मल चित्त का; जो ग्रहीता अर्थात् आत्मा ग्रहण अर्थात् अंत:करण और इंद्रियां तथा ग्राह्य अर्थात् पंचभूत और विषयों - में एकाग्र स्थित होकर उसी विषय के स्वरूप को प्राप्त हो जाना सम्प्रज्ञात समाधि अर्थात् चित्त का विषय के साथ तदाकार हो जाना है ।
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