दूसरे साधकों को श्रद्धा, वीर्य अर्थात् मन का तेज, स्मृति, समाधि और प्रज्ञा अर्थात् सत्य वस्तु के विवेक से - असम्प्रज्ञात समाधि प्राप्त होती है।
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