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योगसूत्र • अध्याय 1 • श्लोक 49
श्रुतानुमानप्रज्ञाभ्यामन्यविषया विशेषार्थत्वात्॥ श्रुत , अनुमान , प्रज्ञाभ्याम् , अन्य , विषया , विशेष: , अर्थत्वात् ॥
श्रवण और अनुमान से होने वाली बुद्धि से ऋतम्भरा प्रज्ञा का विषय भिन्न है, क्योंकि यह विशेष रूप से अर्थ को साक्षात्कार करने के सन्दर्भ में है ।
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