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योगसूत्र • अध्याय 1 • श्लोक 15
दृष्टानुश्रविकविषयवितृष्णस्य वशीकारसंज्ञा वैराग्यम् ॥ दृष्ट , आनुश्रविक , विषय , वितृष्णस्य , वशीकार , संज्ञा , वैराग्यम्॥
देखे हुए और सुने हुए विषयों में सर्वथा तृष्णारहित है, उसका वैराग्य अपर-वैराग्य नाम वाला है।
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