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योगसूत्र • अध्याय 1 • श्लोक 43
स्मृतिपरिशुद्धौ स्वरूपशून्येवार्थमात्रनिर्भासा निर्वितर्का॥ स्मृति , परिशुद्धौ , स्वरूप , शून्या , इव , अर्थ , मात्र , निर्भासा , निर्वितर्का ॥
स्मृति के शुद्ध अर्थात् आगम और अनुमान के शब्द और ज्ञान से रहित हो जाने पर अपने रूप से शून्य हुई जैसी केवल ध्येय अर्थ मात्र के स्वरूप को प्रत्यक्ष कराने वाली चित्त की स्थिति ही; निर्वितर्क समाधि है ।
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