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अध्याय 22 — द्वाविंशतितम अध्याय

शिवभारतम्
40 श्लोक • केवल अनुवाद
कवीन्द्र बोले - दूत के समान वेग से जाने वाली उस दुंदुभी ध्वनि ने शिवाजी के सैनिकों को तत्काल सूचना दे दी।
कमकोजी सोळंखे, येसाजी कंक, तानाजी मालुसरे, कोंडाजी, वरखल और रामजी पांगारकर, ये पांच अग्नि के समान तेजस्वी वीरों ने अकेले हजारों पदातियों के साथ तथा उसी पराक्रम से विख्यात एवं पांच हजार पदातियों के साथ विद्यमान नारायण ब्राह्मण, इन सभी योद्धाओं तथा महायोद्धाओं ने वेग से आकर वन के मध्यभाग में स्थित, अनेक योद्धाओं से युक्त शत्रु की सेना को चारों ओर से घेर लिया।
इस बीच शत्रुओं को भी अफजलखान मारा गया यही बात उच्चध्वनि से बजनेवाली बुंदुभी के द्वारा सहसा ज्ञात होने पर वे सज्ज हो रहे थे कि तभी पर्वत के तट से आये हुए अभिमानी, संरब्ध एवं आक्रमण करने वाले पदाति चारों ओर से दिखाई दिये।
मदरहित हाथी, विषरहित सांप, पगड़ी से रहित मनुष्य, शिखरों से रहित पर्वत, पानी से रहित बादल और धनहीन राजा इन सबके समान वे यवन अफजलखान के बिना उस समय सुशोभित नहीं हो रहे थे।
आकाश के गिरने के समान पिता अफजलखान को मरा हुआ जानकर उसके तीनों पुत्र की बुद्धि के नष्ट हो जाने से वे विचलित हो गये थे।
प्रतिकूल वायु के द्वारा समुद्र में नाव के भग्न होने से उसमें स्थित लोग जैसे जीवन की आशा को छोड़ देते है, उसी प्रकार उन्होंने उस गहन वन में उस समय जीवन की आशा को छोड़ दिया।
तब सेना के अपने सभी सैनिकों के संकट में फंसने के कारण से गर्वरहित एवं बल से नष्ट होकर भागती हुई अपनी सेना को देखकर, स्वामिभाव, शक्तिमान्, अत्यन्त क्रोधी, नाक को ऊपर चढ़ाया हुआ एवं मुंह को फुलाकर, विस्तीर्ण अंजली के समान आंखों से युक्त, हाथी के सूंड के समान भुजाओं एवं भयंकर स्वर से युक्त वह मुसेखान पठान उनको रोककर बोलने लगा।
मुसेखान बोला - स्वामिकार्य करने की इच्छा से अपने प्राणों को तिनके के समान मानकर अफजलखान यदि मर भी गया तो क्या हम सब भी मर गयें?
चारों ओर से पर्वत का मार्ग बंद कर दिया है तो तुम कहां जाओगे? अरे! खड़े रहो और चारों ओर स्थित शत्रुओं को मारो।
अपने स्वामी को, मित्र को या अपने साथी को छोड़कर जो कोई भागकर अपने प्राणों को बचायेगा, उसके जीवन को धिक्कार हैं।
स्वामिकार्य किये बिना अपनी रक्षा करने वाला मनुष्य, अपना मुंह अपने लोगों को कैसे दिखा सकता है?
अत्यन्त भयानक, प्रलयकारी इस तलवार को हाथ में लेकर मैं इन शत्रुओं की सेना को बलात् नष्ट कर दूंगा।
इस प्रकार बोलकर वह महाबाहु महान् घोड़े पर चढ़कर अपनी सेना के साथ शिबिर से वेगपूर्वक निकल गया।
वायु के समान वेगवान्, बलवान्, हसन एवं दुसरे सेनापति भी अपनी-अपनी सेना के साथ उसके पीछे चले गये।
मध्य-मध्य में उबड़-खाबड़ अनेक विस्तीर्ण पत्थरों से व्याप्त घोड़ों के खुरों के आघात से उड़ने वाली चिंगारियों से पूर्ण, पैर के फिसलने से या ठोकरें खाकर गिरने वाले चपल लोगों के भीड़ से व्याप्त वह भूमि उसके हाल-चाल से कंपित हो गई।
तब शत्रु योद्धाओं को देखकर विचलित घुड़सवारों ने अपने घोड़ों को पत्थरों से युक्त मार्ग के ऊपर से भी वेग से आगे ले गयें।
तत्पश्चात् अत्यन्त क्रोधित एवं वेगवान् मुसेखान ने अपने घोड़े को आगे ले जाकर शत्रु के सैनिकों पर बाणों की वर्षा की।
हसन इत्यादि दूसरे सभी क्रोधित धनुर्धरों ने सम्मुख स्थित शत्रुओं को बाणों से जर्जरित कर दिया।
उस समय उनके क्रोधयुक्त शब्दों से, घोड़ों के हिनहिनाने से, युद्ध के आवेश से, बड़े हाथियों द्वारा किए गए प्रचंड चीत्कार से, छडी के प्रहार से बजने वाले नगाड़ों की तीव्र ध्वनि से, विविध वाद्यों के भयानक आवाजों से, उसी प्रकार चारों से अचानक विचलित होकर गुफाओं से बाहर निकले हुए, वाद्य, भालू, जंगली पक्षी, भेड़िया, गेड़े, सुअर आदि गगनभेदी असंख्य कोलाहल से अत्यन्त वेग से परिपूर्ण हुए उस अत्यन्त दुर्गम अरण्य की प्रतिध्वनि के द्वारा उद्धट सैनिकों को अनेक बार धमकाया गया।
अत्यन्त तीक्ष्ण बाणों से विदीर्ण हुए पदातियों ने भी उस युद्ध में अबाधित गति वाले तलवारों से शत्रुओं को भूमि पर गिराया।
दौड़ने वाले उन पदातियों ने घुड़सवारों के घोड़ों के टुकड़े करके उनको मानो स्पर्धा से पदाति ही बना दिया हो।
कोई शत्रु के शस्त्र के प्रहार से रक्तरंजित हो गया तथा नीचे गिरकर सहसा सूर्यलोक ही चला गया।
कोई भयंकर वीर द्वारा जंघाओं के फोड़ने से वह तत्काल भूमि पर गिरकर दुर्योधन की दशा का अनुभव करने लगा।
मुष्टियुद्ध करने वाले किसी वीर शत्रु के दो टुकड़े होने के कारण वह जरासंध के समान विपरीत होकर गिर गया।
तोप से निकले हुए गोले से विदीर्ण छाती वाले कुछ वीर धनुष की प्रत्यंचा को हाथ में पकड़कर ही मृत्यु को प्राप्त हो गए।
बाल एवं तलवार को धारण करने वाला कोई वीर नाना प्रकार के पराक्रम को दिखाकर पराक्रमी वीर पर प्रहार करता हुआ शुशोभित होने लगा।
शिवाजी के पदातिरूपी बादल से भयंकर तलवाररूपी बिजलियों के चारों ओर से गिरने के कारण यवन कंपित हो गए।
जिसने अपने योद्धाओं के सामने अपने मुंह से अपनी प्रशंसा की थी, वह मुसेखान भी उन वीरों द्वारा पराजित हो गया।
फिर घोड़ा नष्ट हो गया, शस्त्र गिर गये और मन भयभीत हो गया, ऐसी स्थिति में वह अभिमानी मुसेखान नष्ट कर दिया गया, बड़े भय से हसन संकट में मग्न हो गया। भयभीत होकर सुकोमल पैरों से युक्त अंकुशखान सामर्थ्य के नष्ट होने से शीघ्र दबे पांव निकल गया, भयभीत दोनों भाईयों को छोड़कर तथा सेना को भी छोड़कर अफजलखान का पिता वेष बदलकर भाग गया।
तत्पश्चात् आदिलशाह की विशाल एवं नायक से हीन सेना पलायन करने लगी तो शिवाजी के सैनिकों ने उन पर चारों ओर से प्रहार किया।
शहाजीराजा का भाई जो मैं भोंसले हूं, मेरे से युद्ध करो, इस प्रकार बोलते हुए मंबाजी को वहीं पर जन्म बंधन से मुक्त कर दिया।
अत्यन्त तेजस्वी पराक्रम के कारण सभी के लिए अत्यन्त दुःसह, पराक्रमी, शोण के पुत्र, क्रोधी, राक्षस की तरह पराक्रमी, जुए की तरह दीर्घ भुजाओं से युक्त, अभिमानी, सुदृढ़ शरीर वाला, जवान, फंरादखान का पौत्र रणदुल्ला, वह पर्वत के शिखर के समान अपने सिर को नमन करते ही शिवाजी की सेना के अधीन होकर कैद हो गया।
अंबरखान का पुत्र भयभीत अंबर निस्तेज होकर प्राण बचाने की इच्छा से कवच, तलवार, दाल और धनुष फेंककर शिवाजी के सैनिकों के अधीन होकर कैद हो गया।
हाथी के समान मदमस्त राजाजी घाटगे यह शिवाजी की सेना के अधीन होकर कैद हो गया।
जिनको उनके पिता एवं भाईयों ने छोड़ दिया था, वे अफजलखान के पुत्र शिवाजी की सेना के अधीन होकर कैदे हो गये।
एक हजार, दो हजार, तीन हजार, पांच हजार, छः हजार, सात हजार ऐसे राक्षस की तरह आदिलशाह के दूसरे भी अनेक तेजस्वी सेनापति बाण के टूट जाने से शिवाजी की सेना के अधीन होकर कैद हो गये।
गिरा दिये गए, गिरने वाले, गिराये जाने वाले एवं भागे हुए वीरों से अत्यन्त भयंकर वह युद्धभूमि वर्णनीयता को प्राप्त हो गई।
पाश, भाले, तलवार, पट्ट, परशु, मुगर, परिघ, त्रिशूल, तोमर, गदा, शक्ति, धनुष, बाणों से पूर्ण तरकस, ढाल, चक्र, चाकू, कटार, कवच, शिरखाण, सोने की कमर की बेल्ट, चमड़े के दस्ताने, चमड़े के हाथ, तोप, दुंदभी आदि वाद्य, पताका, ध्वज, बिरुद, इधर-उधर गिरे हुए छातें, छत, कर्ण आभूषण, अनेक रंगों से युक्त, अत्यधिक विशाल एवं अतिमूल्यवान्, अनेक तंबू, कलस, बर्तन, शराब के पात्र, थूकने का पात्र, चांदी एवं सोने के पलंग, इधर-उधर गिरे सामान से व्याप्त खुला मुंह होने के कारण दांतों का स्पष्ट दिखना निश्चल नेत्र, पगड़ी रहित सिरों के द्वारा उग्र स्वरूप, रत्नों की अंगुठियों से युक्त, कोमल उंगुलियों के कन्धे के पास से टुटकर गिरे हुए हाथों से, मानों शरीर श्रृंगारित प्रतीत हो रहा था, जोड़ों के पास से टुटे हुए एवं बड़े खम्बे की तरह भारी जांघों वाले, घुटनों एवं टखनों के पास से टुट हुए पैरों से कहीं उंची हो गई, मस्तक से टुटे हुए भाग को खाने में मग्न, तीक्ष्ण चोंच वाले गिधडों के पंखों की उसके मार्ग पर छाया पड़ रही थी, जैड़कर आने वाले अपने स्वामी से अत्यन्त डरने वाले लोमड़ी के झुंड से व्याप्त और कहीं पर रक्त को उड़ाकर खेलने वाला डाकिनियों का मण्डल था, जिन्होंने भयंकर दंताग्र से चमड़ी, मांस तोड़कर बाहर निकाला है एवं जिनके अंगों को ढ़ोने से रक्तरंजित पिशाचों से व्याप्त, कहीं पर शंकर को चढ़ाई गई माला से आनन्दित योगिनीयों से युक्त ऐसी वह जयवल्ली की अरण्यभूमि, उस समय जयवल्ली नाम के योग्य बनीं।
इस प्रकार शत्रु सेना को जीतकर उस पदाति के सभी सेनानायक आनन्दित एवं अतिशय गर्व से युक्त हो गये। फिर वेग से कैद किए गए उन शत्रु के सेनापतियों को पग-पग पर आगे ढकलते हुए उनको शिवाजी के दर्शन करवाये।
कुछ को युद्ध में मार दिया, कुछ को कौतुक के साथ भगा दिया और कुछ शत्रु योद्धाओं को क्रोधित शिवाजी ने जेल में डाल दिया, तीनों लोगों की रक्षा करने वाले, दुष्टों का नाश करने वाले, पृथ्वी के भय को समाप्त करने वाले एवं क्षत्रिय लीला करने वाले विश्वभर के लिए क्या यह आश्चर्य कारक नहीं है?
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