पाश, भाले, तलवार, पट्ट, परशु, मुगर, परिघ, त्रिशूल, तोमर, गदा, शक्ति, धनुष, बाणों से पूर्ण तरकस, ढाल, चक्र, चाकू, कटार, कवच, शिरखाण, सोने की कमर की बेल्ट, चमड़े के दस्ताने, चमड़े के हाथ, तोप, दुंदभी आदि वाद्य, पताका, ध्वज, बिरुद, इधर-उधर गिरे हुए छातें, छत, कर्ण आभूषण, अनेक रंगों से युक्त, अत्यधिक विशाल एवं अतिमूल्यवान्, अनेक तंबू, कलस, बर्तन, शराब के पात्र, थूकने का पात्र, चांदी एवं सोने के पलंग, इधर-उधर गिरे सामान से व्याप्त खुला मुंह होने के कारण दांतों का स्पष्ट दिखना निश्चल नेत्र, पगड़ी रहित सिरों के द्वारा उग्र स्वरूप, रत्नों की अंगुठियों से युक्त, कोमल उंगुलियों के कन्धे के पास से टुटकर गिरे हुए हाथों से, मानों शरीर श्रृंगारित प्रतीत हो रहा था, जोड़ों के पास से टुटे हुए एवं बड़े खम्बे की तरह भारी जांघों वाले, घुटनों एवं टखनों के पास से टुट हुए पैरों से कहीं उंची हो गई, मस्तक से टुटे हुए भाग को खाने में मग्न, तीक्ष्ण चोंच वाले गिधडों के पंखों की उसके मार्ग पर छाया पड़ रही थी, जैड़कर आने वाले अपने स्वामी से अत्यन्त डरने वाले लोमड़ी के झुंड से व्याप्त और कहीं पर रक्त को उड़ाकर खेलने वाला डाकिनियों का मण्डल था, जिन्होंने भयंकर दंताग्र से चमड़ी, मांस तोड़कर बाहर निकाला है एवं जिनके अंगों को ढ़ोने से रक्तरंजित पिशाचों से व्याप्त, कहीं पर शंकर को चढ़ाई गई माला से आनन्दित योगिनीयों से युक्त ऐसी वह जयवल्ली की अरण्यभूमि, उस समय जयवल्ली नाम के योग्य बनीं।
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