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शिवभारतम् • अध्याय 22 • श्लोक 38
पाशैः प्रासैचंद्रहासैः पट्टिशैश्च परश्वधैः । मुगरैः परिधैस्तद्वत् त्रिशूलैस्तोमरैरपि ॥ गदाभिश्शक्तिभिश्वापैर्निषङ्गैरिषुपूरितैः । खेटकैथापि चक्रैश्व छुरिकाभिः कटारकैः ॥ तनुत्रैश्च शिरखैव स्वर्णसारसनैस्तथा । तलत्रैरङ्‌गु‌लित्रैश्च यन्त्रैराग्नेयसंज्ञिकैः ॥ आनकप्रमुखैर्वाहीः पताकाभिर्ध्वजैरपि । बिरुदैरातपत्रैश्च प्रकीर्णैश्च प्रकीर्णकैः ॥ उल्लोचैः काण्डपटकैरनेकैः पटमण्डपैः । नैकवर्णः सुविस्तीर्णैः महार्हक्षीमजन्मभिः ॥ त्रिपदैः करकैः स्थालैश्चषकैश्च पतग्रहैः । चतुष्कैर्मञ्चकैश्चापि रूप्यकाञ्चननिर्मितैः ॥ इतस्ततः परिस्रस्तैस्तैस्तैर्वखैश्च भूरिशः । अन्यैरपि महासैन्यसंभारैरभितः श्रिता ॥ विवृतास्यपरिस्पष्टदशनैः स्तब्धलोचनैः । शिरोभिर्विगतोष्णीषैरुग्रवेषवती क्वचित् ॥ आबाहुमूलात्पतितैर्धूतरत्ना‌ङ्गुलीयकै : ।। क्वचित्प्रसाधताङ्गीव कोमलाङ्‌गुलिभिः करैः ॥ स्थूलस्थूणोपमैर्मूलाच्छिन्नैरुरुभिरुरुभिः । जानुजंघाग्रविभ्रष्टैरंघ्रिभिश्वोच्छ्रिता क्वचित् ॥ गृधैरुत्कृत्तमस्तिष्कग्रासग्रसनलम्पटैः । पटुचञ्चूपुटैः पक्षप्रच्छायितपथा क्वचित् ।। आपतन्निजयूथ्योग्रत्रस्यत्कोष्टुकुलाकुला। क्षतजोत्क्षेपणक्क्रीडड्डाकिनीमण्डला क्वचित् ॥ दर्शितोदग्रदन्तायनिकृत्तान्त्रवसामिषैः । सुतलोहितलिप्ताङ्गैः पिशाचैवाञ्चिता क्वचित् ॥ हरहारविधिप्रीतयोगिनी योगिनी क्वचित् । सा तदाधिगतार्थाभूज्जयवल्लीवनावनी ॥
पाश, भाले, तलवार, पट्ट, परशु, मुगर, परिघ, त्रिशूल, तोमर, गदा, शक्ति, धनुष, बाणों से पूर्ण तरकस, ढाल, चक्र, चाकू, कटार, कवच, शिरखाण, सोने की कमर की बेल्ट, चमड़े के दस्ताने, चमड़े के हाथ, तोप, दुंदभी आदि वाद्य, पताका, ध्वज, बिरुद, इधर-उधर गिरे हुए छातें, छत, कर्ण आभूषण, अनेक रंगों से युक्त, अत्यधिक विशाल एवं अतिमूल्यवान्, अनेक तंबू, कलस, बर्तन, शराब के पात्र, थूकने का पात्र, चांदी एवं सोने के पलंग, इधर-उधर गिरे सामान से व्याप्त खुला मुंह होने के कारण दांतों का स्पष्ट दिखना निश्चल नेत्र, पगड़ी रहित सिरों के द्वारा उग्र स्वरूप, रत्नों की अंगुठियों से युक्त, कोमल उंगुलियों के कन्धे के पास से टुटकर गिरे हुए हाथों से, मानों शरीर श्रृंगारित प्रतीत हो रहा था, जोड़ों के पास से टुटे हुए एवं बड़े खम्बे की तरह भारी जांघों वाले, घुटनों एवं टखनों के पास से टुट हुए पैरों से कहीं उंची हो गई, मस्तक से टुटे हुए भाग को खाने में मग्न, तीक्ष्ण चोंच वाले गिधडों के पंखों की उसके मार्ग पर छाया पड़ रही थी, जैड़कर आने वाले अपने स्वामी से अत्यन्त डरने वाले लोमड़ी के झुंड से व्याप्त और कहीं पर रक्त को उड़ाकर खेलने वाला डाकिनियों का मण्डल था, जिन्होंने भयंकर दंताग्र से चमड़ी, मांस तोड़कर बाहर निकाला है एवं जिनके अंगों को ढ़ोने से रक्तरंजित पिशाचों से व्याप्त, कहीं पर शंकर को चढ़ाई गई माला से आनन्दित योगिनीयों से युक्त ऐसी वह जयवल्ली की अरण्यभूमि, उस समय जयवल्ली नाम के योग्य बनीं।
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