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शिवभारतम् • अध्याय 22 • श्लोक 32
पौत्रः फरादखानस्य नाम्ना यो रणदूलहः । तेजसा तीव्रतीतत्रेण सर्वेणापि सुदुःसहः ॥ साहसी शोणतनयः कोपी कोणपविक्रमः । युगदीर्घभुर्जी आनी घनसंहननो युवा ॥ स निजं प्रहयन्नेव शैलशृङ्गसमं शिरः । शिवसैन्यवशं यातो बत बन्धमुपाददे ॥
अत्यन्त तेजस्वी पराक्रम के कारण सभी के लिए अत्यन्त दुःसह, पराक्रमी, शोण के पुत्र, क्रोधी, राक्षस की तरह पराक्रमी, जुए की तरह दीर्घ भुजाओं से युक्त, अभिमानी, सुदृढ़ शरीर वाला, जवान, फंरादखान का पौत्र रणदुल्ला, वह पर्वत के शिखर के समान अपने सिर को नमन करते ही शिवाजी की सेना के अधीन होकर कैद हो गया।
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