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शिवभारतम् • अध्याय 22 • श्लोक 4
निर्मदा इव मात‌ङ्गा निर्विषा इव पन्नगाः । निरुणा इव नरा निःशृ‌ङ्गा इव भूधराः ॥ निर्जीवना इव घनाः क्षितीशा इव निर्धनाः । विरेजिरे न यवनास्ते तदाफजलं विना ॥
मदरहित हाथी, विषरहित सांप, पगड़ी से रहित मनुष्य, शिखरों से रहित पर्वत, पानी से रहित बादल और धनहीन राजा इन सबके समान वे यवन अफजलखान के बिना उस समय सुशोभित नहीं हो रहे थे।
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