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शिवभारतम् • अध्याय 22 • श्लोक 2
सौलक्षिकः कमलजिद्यशोजित् कंक एव च। तानाजिन्मल्लसूरश्च कुण्डो वरखलस्तथा ॥ रामः पाङ्‌ङ्गारिकश्चामी पञ्च पञ्चाग्नितेजसः । एकैकेन सहखेण पत्तीनां परिवारिताः ॥ सहस्रः पञ्चभिस्तद्वद्वतो नारायणो द्विजः । क्षात्रेण कर्मणा ख्यातः सर्वेऽप्येते महायुधाः ॥ बह्वायुधीयगहनां गहनान्तरवर्तिनीम् । यादवारयन्नेत्य परितः परवाहिनीम् ॥
कमकोजी सोळंखे, येसाजी कंक, तानाजी मालुसरे, कोंडाजी, वरखल और रामजी पांगारकर, ये पांच अग्नि के समान तेजस्वी वीरों ने अकेले हजारों पदातियों के साथ तथा उसी पराक्रम से विख्यात एवं पांच हजार पदातियों के साथ विद्यमान नारायण ब्राह्मण, इन सभी योद्धाओं तथा महायोद्धाओं ने वेग से आकर वन के मध्यभाग में स्थित, अनेक योद्धाओं से युक्त शत्रु की सेना को चारों ओर से घेर लिया।
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