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शिवभारतम् • अध्याय 22 • श्लोक 29
अथ ध्वस्तहये त्रस्तशखे वित्रस्तचेतसि । अपक्रामति संग्रामात् मुसेखानेऽभिमानिनि ॥ सद्यो यापितवैयात्ये याकुतेऽप्यपयायिनि । अत्याहितेन हसने व्यसनेषु निमज्जति ॥ भयश‌ङ्कुवशे क्षिप्रमंकुशे विगतौजसि । मृदुभ्यामपकोषाभ्यां पदाभ्यामपसर्पति ॥ कातरी भ्रातरी हित्वा ज्यायानफजलात्मजः । विहाय सेनां चास्थाय रूपान्तरमपासरत् ॥
फिर घोड़ा नष्ट हो गया, शस्त्र गिर गये और मन भयभीत हो गया, ऐसी स्थिति में वह अभिमानी मुसेखान नष्ट कर दिया गया, बड़े भय से हसन संकट में मग्न हो गया। भयभीत होकर सुकोमल पैरों से युक्त अंकुशखान सामर्थ्य के नष्ट होने से शीघ्र दबे पांव निकल गया, भयभीत दोनों भाईयों को छोड़कर तथा सेना को भी छोड़कर अफजलखान का पिता वेष बदलकर भाग गया।
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