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शिवभारतम् • अध्याय 22 • श्लोक 19
तदा रोषारवैस्तेषां हयानां हृषितैरपि । वृंहितेच महेभानां युद्धावेशोपबृंहितैः ॥ चण्डदण्डाहतानां च पटहानां पटुस्वनैः । विविधानां च वाद्यानां निनादर्भृशभीषणेः ॥ तथाभितस्तरक्षणां ऋक्षाणां वनपक्षिणाम् । शार्दूलानां वृकाणां च ख‌ङ्गिनां वनदंष्ट्रिणाम् ॥ निर्गतानां दरीगर्भात् सद्यः क्षुभितचेतसाम् । कोलाहलैः सुबहुभिर्गगनोदरगामिभिः ॥ प्रसभं पूरितात्युच्चैरटवी सातिस‌ङ्कटा । प्रतिध्वानैः प्रतिभटानुद्धटान् बह्नतर्जयत् ॥
उस समय उनके क्रोधयुक्त शब्दों से, घोड़ों के हिनहिनाने से, युद्ध के आवेश से, बड़े हाथियों द्वारा किए गए प्रचंड चीत्कार से, छडी के प्रहार से बजने वाले नगाड़ों की तीव्र ध्वनि से, विविध वाद्यों के भयानक आवाजों से, उसी प्रकार चारों से अचानक विचलित होकर गुफाओं से बाहर निकले हुए, वाद्य, भालू, जंगली पक्षी, भेड़िया, गेड़े, सुअर आदि गगनभेदी असंख्य कोलाहल से अत्यन्त वेग से परिपूर्ण हुए उस अत्यन्त दुर्गम अरण्य की प्रतिध्वनि के द्वारा उद्धट सैनिकों को अनेक बार धमकाया गया।
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