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अध्याय 1 — प्रथम अध्याय

शिवभारतम्
92 श्लोक • केवल अनुवाद
वंदन करने वाले, देवश्रेष्ठ के सिर पर स्थित मंदार पुष्प की माला से जिनके पैर रूपी कमलों का पसीना छूट गया है। ऐसे विष्णु को मैं बार-बार नमस्कार करता हूं।
किसी समय परमानंद शर्मा नाम का श्रेष्ठ ब्राह्मण तीर्थ यात्रा करने के लिए वाराणसी गया।
जिस वाराणसी में जाकर सभी व्यक्ति मुक्त हो जाते हैं, किंतु मुक्ति का मोक्ष नहीं होता है अर्थात! जहां मुक्ति सदा वास करती है और जहां पर स्वयं शंकर तारक रूप ब्रह्मा का उपदेश करते हैं,
ऐसे उस काशी में तीर्थ विधि करके तथा महादेव के दर्शन करके वह धर्मज्ञ ब्राह्मण पवित्र भागीरथी के तट पर रहने लगा।
भागीरथी के तट पर पद्मासन में बैठे हुए, विद्या के तेज से शोभायमान, सभी शास्त्रों को जानने वाले, तथा विख्यात श्रेष्ठ अध्यात्म विद्या को जानने वाले,
पौराणिक लोगों के लिए मुकुट मणि, एकवीरा देवी की कृपा से वाक् सिद्धि रूपी धन को प्राप्त करने वाले,
परमानंद की प्रतिमूर्ति जो गोविंद भट्ट के पुत्र हैं ऐसे कवियों में श्रेष्ठ सर्वगुण संपन्न परमानंद को देखकर काशी के निवासी पंडितों को अत्यंत हर्ष हुआ।
उन उदार चरित पंडितों का उसने उठकर अभिवादन किया और घर में आए हुए अतिथि के समान उनका विधि पूर्वक सम्मान किया।
वे सभी काशी के निवासी श्रेष्ठ ब्राह्मण शिवाजी महाराज के प्रसिद्ध चरित्र को सुनने की इच्छा से उनके चारों तरफ बैठ गए।
तत्पश्चात प्रसन्न चित्त सभी पंडित सुंदर काव्य के कर्ता तथा बृहस्पति के अवतार उस परमानंद को बोले।
पंडित ने कहा- जो राजगढ़ का अधिपति राजा इस पृथ्वी पर शासन कर रहा है, जिसको तुलजाभवानी की कृपा से राज्य प्राप्त हुआ है, जो महान तपस्वी,
विशेष रूप से विष्णु का अंश और अष्ट लोकपालों के अंश से उत्पन्न है, जो बुद्धिमान, प्रसन्नचित्त, पराक्रमी, जितेंद्रिय,
भीम की तुलना में अत्यधिक भयंकर और जो सभी धनुर्धारियों का मुकुटमणि, बुद्धिमान, उदार चरित्र, गौरवशाली, अद्भुत पराक्रमी,
कृतज्ञ, सुकार्य करने वाला, आत्मसंयमी और जो अपने सगुणों से सुविख्यात है, जो सत्यवक्ता एवं अत्यधिक चतुरता से सुनने वाला,
देव, ब्राह्मण तथा गायों का रक्षक, अदम्य यवनों के लिए साक्षात् यमराज, शरणागत की रक्षा करने वाला तथा जो प्रजाप्रिय है
ऐसे शिवाजी राजा का सारगर्भित चरित्र जो अनेक अध्यायों में आपने भगवती देवी की कृपा से प्रकाशित किया है,
जिसका शब्द-विन्यास उत्कृष्ट, अद्भुत, अर्थगांभीर्य, माधुर्य तथा अन्य गुणों से युक्त आभूषणों से सुशोभित है।
जो धर्म और अर्थशास्त्र के शास्त्रों के अर्थों से भरा हुआ है। जो पुराने और नये सभी लोकों में उतना ही प्रसिद्ध है।
जो अपनी विशेषताओं से सभी दोषों से मुक्त है। हे सब वस्तुओं के ज्ञाता व्रत द्वारा स्तुति किये गये शेष भाग को हमें बताइये।
काशी पंडितों के अनुरोध पर धर्मात्मा और वक्ताओं में श्रेष्ठ उस कविंद्र ने इस प्रकार कहा।
भगवती एकवीरा, गणपति, सरस्वती, और सिद्ध लोगों को भी सिद्धि प्रदान करने वाले महासिद्ध सद्गुरु को प्रणाम करके,
भरतवंश के भारत के समान बुद्धिमान शिवाजी महाराज के चरित्र का वर्णन करता हूं।
कलियुग के पापों का नाश करने वाली और लोगों के मनों का हरण करने वाली शिवराज की यशोगाथा हमें सुननी चाहिए।
जो यह वीर, गढ़ों का स्वामी, दक्षिण का महाराजा, साक्षात् विष्णु का अवतार, यवनों का वध करने वाला, शाहजी राजा का पुत्र, शिवाजी विजयी हुआ है,
वह एक बार मुझ ब्रह्मनिष्ठ से निवेदन करते हुए बोला की,
हे सुमते! जो जो कार्य मेरे द्वारा किए गए और पृथ्वी पर किए जा रहे उन सभी कार्यों का वर्णन करें।
मेरे प्रसिद्ध दादा मालोजी राजे से शुरू करते हुए, हे महाभाग्यशाली! आप ही इस महान कहानी का वर्णन करो।
हे ब्राह्मणों! उनके इन पवित्र वचनों का आदर करते हुए मैंने उसे स्वीकार कर लिया और जब मैं घर आया, तो मैं स्वयं से विचार करने लगा।
कि भारत के समान इस महान अलौकिक चरित्र की रचना मेरे हाथों से हो, ऐसी शिवाजी की इच्छा किस प्रकार पूर्ण हो सकती है?
इस प्रकार बहुत देर तक एकाग्रता से विचार करने पर स्वयं भगवती एकवीरा देवी ने साक्षात् दर्शन देकर मेरे से इस प्रकार कहा।
देवी ने कहा- हे कविश्रेष्ठ! तुम चिंता मत करो, मैं आपसे प्रसन्न हूं। मेरी आज्ञा से शिवराजा ने तुम्हें यह कार्य बताया है।
इस प्रकार मुझे धैर्य प्रदान करते हुए, उस कृपालु कुलदेवता चतुर्भुजा एकवीरा देवी ने मेरे हृदय में प्रवेश कर लिया।
तब से देखते हुए वह संपूर्ण वाग्ब्रह्म अर्थ के साथ मेरी जीभ पर स्थित होकर जाग रहा है।
अतीत और भविष्य की सभी चीजें मुझे प्रत्यक्ष दिखाई देने से मानों मैं एक अलौकिक व्यक्ति की तरह बन गया हूं।
हे विद्वान पंडितों, मैंने स्वयं को धन्य समझकर फिर यह अत्यंत पवित्र, पुण्यशाली इतिहास रचा।
जिसमें शंभू महादेव की और दुष्ट राक्षसों का नाश करने वाली तुलजा भवानी की महिमा का वर्णन किया गया है।
जहां पर धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चार पुरुषार्थों का और तीर्थों की महानता का भी अच्छी तरह उल्लेख किया गया है।
इस पृथ्वी पर जिनका अवतार यवनों के विनाश हेतु ही हुआ ऐसे शिवाजी ने यवनों के साथ किए गए युद्धों का वर्णन जिसमें (शिवभारतम्) वर्णित है।
देव, ब्राह्मणों तथा गायों की महिमा का और पवित्र एवं अद्भुत राजाओं के चरित्रों का वर्णन जिसमें वर्णित है।
हाथियों, घोड़ों और किलों के सम्पूर्ण लक्षण और शाश्वत राजनीति के चरित्र का जिसमें वर्णन है,
ऐसे पवित्र सूर्यवंश के प्रारंभ से लेकर मेरे द्वारा वर्णित चरित्र को, हे श्रोताओं! हम सभी को ध्यानपूर्वक सुनना चाहिए।
दक्षिण में स्वयं सूर्य के समान उज्ज्वल श्रीमान मालवर्मा राजा सूर्यवंश में हुआ था।
क्षत्रधर्म धुरिन और हंसमुख ऐसा वह मराठा राजा महाराष्ट्र में शासन कर रहा था।
जो विष्णु के समान शक्तिशाली और कमल की तरह बड़ी आंखों वाला, वह गुण गंभीर, राजा अपनी प्रजा को सुख देने से उनकी कीर्ति चारों ओर फैलने लगी।
उस धर्मात्मा ने पुणे प्रांत में अपना निवास स्थान बनाया और भीम नदी के किनारे राज्य का विस्तार किया।
जिसने अपने सरपट दौड़ते घोड़ों के खुरों से भीम नदी के तटीय क्षेत्रों को रौंदा, जिसके दुंदुभी से उठती ध्वनि की लहरों ने समुद्र को हिला दिया,
जिसने अपने प्रताप से शत्रु राजाओं को परास्त कर दिया ऐसा - वह बलशाली राजा अपने ही बल से समस्त सह्याद्री प्रदेश का स्वामी हो गया।
विष्णु के अंश से उत्पन्न, सभी धनुर्धारियों का नेता, मानो दुसरा अर्जुन ही हो, ऐसा वह महाराजा शत्रुओं के लिये अपराजेय हो गया।
जिस प्रकार सत्यवान ने सावित्री के साथ विवाह किया, उसी प्रकार उस राजा ने उच्च कुल में पैदा हुई उमा नाम की यशस्वी कन्या के साथ विधिपूर्वक विवाह किया।
फिर, वह रघुराज का पुत्र अज जैसे साध्वी इंदुमति को मानता था, वैसे ही वह मालवर्मा राजा अनुरूप गुणों से सुशोभित अपनी पत्नी को बहुत मानने लगा।
मानो, पार्वती ने स्वयं प्रसाद रूप में दिए हुए अपने उमा इस नाम को, वह साध्वी उमा सुशोभित करने लगी।
तत्पश्चात, कुबेर के समान धन संपन्न, बुद्धिमान और ज्ञानवान उस राजा ने अपने रूपवती पत्नी के साथ अनेक प्रकार के धर्म कार्य किए।
अग्निहोत्र, सत्रयज्ञ, अत्यधिकं दक्षिणा वाले यज्ञ और उसी प्रकार महादान भी उसके राज्य में सदा चलते रहते थे।
उस शिवभक्त राजा ने शंकर को प्रसन्न करने के लिए सागर के समान विशाल मधुर जल वाले तालाब को शंभू पर्वत पर खुदवाया।
उस धर्मात्मा ने, ऊंचे बाहरी दरवाजों से युक्त मेरुपर्वत जैसे महलों का, अनेक वृक्षों से सुशोभित सुन्दर बगीचों का,
सोने की सीढ़ियों से युक्त बड़े-बड़े कुओं का, अनेक जल-कुंडों का तथा धर्मशालाओं का निर्माण करवाया।
जैसे गंगा भागीरथी का अनुसरण करती थी, उसी तरह एक शक्तिशाली और विशाल चतुरंग सेना उस शक्तिशाली राजा का अनुसरण करती थी।
जैसे लहरें हवा के कारण किनारे से उठती हुई समुद्र को नमन करती (झुकती) हैं, वैसे ही उन सामन्त राजाओं ने उस समृद्ध मालवर्मा राजा को नमन किया।
उसी समय, देवगिरी (दौलताबाद) में आश्रय लेकर धर्मपरायण निजाम शाह पृथ्वी पर शासन कर रहा था।
यादवादि दक्षिण के सभी राजा सदैव उस यवनाधिपति राजा की सेवा में लगे रहते थे।
उस समय यवनों से घिरा हुआ आदिलशाही यवन बीजापुर में रहते हुए शासन कर रहा था।
कुछ समय बाद किसी कारण आदिलशाह और निजाम शाह के बीच बड़ी लड़ाई छिड़ गई।
तब बुद्धिमान निजाम शाह ने ऐसा सुना कि मालवर्मा राजा दुश्मनों के लिए काल के समान है, इसलिए उसने अपनी मदद के लिए उसे बुलाया।
तब वह उसका (निजामशाही) प्रिय करने के लिए अद्वितीय, गौरवशाली मालवर्मा राजा देवगिरी में जाकर रहने लगा।
उसका भीम के समान पराक्रमी विठ्ठल नाम का भाई भी अपनी सेना के साथ आकर निजामशाह के साथ मिल गया।
उनके आगमन से संतुष्ट होकर निजामशाह ने भी उन्हें साम, दान इत्यादि से उन दोनों को सम्मानित किया।
शक्तिशाली मालवर्मा राजा ने निजामशाह के जो जो शत्रु हुए, उन सभी का उसने सफाया कर दिया।
इंद्र के समान शक्तिशाली विठ्ठल राजा ने भी निजामशाह की मदद करके उनकी आकांक्षाओं को पूरा किया।
वहां निजाम शाह के कई अन्य समर्थक विद्यमान थे, लेकिन उनमें मालवर्मा ही सबसे श्रेष्ठ थे।
उसने अपने मंत्रियों को पैतृक राज्य सौंप दिया और निजाम शाह द्वारा दिए गए राज्य पर वह शासन करने लगा।
अपने को पुत्र प्राप्ति होने से इस राजलक्ष्मी को शोभा प्राप्त होगी, इस आशा के साथ उन्होंने अपनी पत्नी के साथ कई दिन बिताए।
तब वह पुत्र-प्राप्ति का इच्छुक राजा अपनी धर्मपत्नी के साथ बड़े व्रतों का आचरण करते हुए, देवाधिदेव महादेव की पूजा करने लगा।
तत्पश्चात, बहुत दिनों के बाद, गौरवशाली मालवर्मा की पत्नी गर्भवती हुई और अपने पति को खुशी प्रदान की।
दसवें महीने में राजचिह्नों से सुशोभित, सुंदर एवं अलौकिक पुत्र उसको शुभ मुहूर्त में उत्पन्न हुआ।
उसकी नाक सीधी, आँखें बड़ी, माथा चौड़ा, बाल पुंघराले एवं अल्प, छाती चौड़ी, बाहें लंबी, गर्दन भरी हुई,
रंग सोने जैसा और उसके हाथ, पैर लाल एवं कोमल थे, और उसकी प्रचुर चमक ने घर को रोशन कर दिया।
दाइयों को उसे देखकर प्रसन्नता हुई, और उन्होंने जल्दी से राजा को अपने रनिवास नौकरों के माध्यम से यह खबर सुनाई।
पुत्र के जन्म की खुशखबरी सुनकर मानो उसका पूरा शरीर अमृत, की वर्षा से सिंचित हो गया हो। (इतना वह हर्षित हुआ)
तब आनंद के सागर में तैरने वाला एव अपने पुत्र को देखने के लिए उत्सुक वह राजा जल्दी से रनिवास में चला गया; और उसने अपने सुकोमल पुत्र का मुख देखा।
तब प्रसन्न राजा ने अपने पुरोहित के साथ स्वास्तिवाचन-पूर्वक उस बालक का जातकर्म संस्कार किया।
कार्तिक कुमार जैसे प्रतापी राजकुमार के जन्म के अवसर पर मंगल वाद्य बजने लगे। वारयोषिताओं ने नृत्य करना शुरू किया,
गायक मधुर और उच्च धुन के साथ गीत गाने लगे। भाटों ने प्रसिद्ध बिरुदावली का उच्च स्वर में पाठ करना शुरू किया।
द्विजश्रेष्ठों ने अपने फलदायी आशीर्वाद के साथ उनको बधाई देना शुरू किया, और घर-घर में उस त्योहार को विशेष अंदाज में मनाया गया।
उसने याचकों को बहुमूल्य मोती, रत्नजडित आभूषण और मोतियों से अलंकृत जवाहरात, और वख, गाय, घोड़े और हाथी दिए।
उस समय वह लोगों को कल्पवृक्ष के समान प्रतीत हुआ।
ज्योतिषियों द्वारा बताए गए और धर्म का अनुसरण करने वाले शुभ दिन के अवसर पर मालवर्मा ने अपने पुत्र का नाम शाहजी रखा।
कमल के समान सुन्दर मुख वाला वह बालक दिन-ब-दिन बड़ा होता गया और साथ ही वह अपने माता-पिता के दृष्टि को आनन्द देने वाली अपनी लीलाओं से आनंदित करने लगा।
दो साल बाद मूर्तिमत उत्सव-आनंद के समान उसे एक और बेटा पैदा हुआ।
पंडितों की मदद से उसका यथाविधि संस्कार करके सिद्ध पुरुषों द्वारा बताएं गए नाम के अनुसार उनका नाम शरीफजी रखा गया।
सिद्ध पुरुषों के नाम को धारण करने वाले ऐसे वे कुल के दीपक, पुत्र शहाजी और शरीफजी बड़े होने लग गए और उनके साथ उनकी संपत्ति भी बढ़ने लगी।
तत्पश्चात वह राजगुणों युक्त पुत्रों के कारण राजा अपने रिश्तेदारों के साथ आनन्दित हुआ, और यह मानने लगा कि उसका वंश पृथ्वी पर बढ़ गया है।
कलियुग के पाप का नाश करने वाले और लोकप्रसिद्ध मेरे द्वारा किए गए इन राजकुमारों के जन्म वर्णन को सुनकर बुद्धिमान व्यक्ति को लगता है कि उसकी इच्छा पूरी हो गई है।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
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