मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें

अध्याय 1 — शाट्यायनीय उपनिषद

शाट्यायनीय
42 श्लोक • केवल अनुवाद
वह (ब्रह्म) पूर्ण है, यह (जगत्) भी पूर्ण है। (उस) पूर्ण ब्रह्म से ही यह पूर्ण विश्व प्रादुर्भूत हुआ है। उस पूर्ण ब्रह्म में से इस पूर्ण जगत् को निकाल लेने पर पूर्ण ब्रह्म ही शेष रहता है। ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।
मन ही मनुष्यों के बन्धन एवं मोक्ष का कारण है। विषयादि भोगों में आसक्त मन बन्धन का और विषय-वासनाओं से पराङ्मुख मन मोक्ष का कारण है।
जैसे यह मन सांसारिक विषय-भोगों में आसक्त रहता है, ऐसा यदि ब्रह्म में आसक्त हो जाये, तो फिर ऐसे कौन से सांसारिक बन्धन हैं, जिनसे मुक्ति न मिलती हो, अर्थात् सभी बन्धनों से मुक्ति मिल जाती है।
चित ही संसार है। हर पुरुष को अभ्यास द्वारा अपने चित्त का शोधन करना चाहिए। जो अपने चित्त को ब्रह्म में लगाता है, वह मनुष्य ब्रह्ममय हो जाता है। यह शाश्वत और परम गोपनीय बात है।
वेदत्तत्त्व को न जानने वाले के लिए तो विराट् है ही नहीं, वह उसे मानता ही नहीं। ब्रह्म के ज्ञान से हीन मनुष्य उस परम स्वप्रकाशित धाम को प्राप्त ही नहीं करता। तत्त्वदर्शी विवेकवान् ब्राह्मण ही व्यापक, सर्वज्ञ, सर्वान्तर्यामी उस वासुदेव को अपने स्वरूप में (अहं ब्रह्मास्मि) समझता हुआा विप्रत्व और जीवन्मुक्ति के तत्त्व को प्राप्त कर पाता है।
वेद में निष्णात तथा सभी तरह की इच्छाओं-कामनाओं से रहित होकर जो पुरुष सनकादिक की भाँति उस परमब्रह्म, सत्य-सनातन के स्वरूप को समझते हैं। वे सभी ब्रहा के रूप वाले ही हो जाते हैं। ऐसा पुरुष अपनी इन्द्रियों को वश में रखने वाला सभी विषय भोगों से तृप्त, पराङ्मुख, सहनशील, वेदज्ञ, मुमुक्षुओं की भाँति उस परमब्रह्म को समझ लेता है। वह पुरुष सभी इच्छाओं से विरत, पितृदेव एवं गुरु के ऋणों से मुक्त होकर उस परब्रह्म को जान करके शान्त-मौन होकर कहीं आश्रम में निवास करे।
इसके बाद अन्तिम संन्यास आश्रम में प्रविष्ट होकर के यथाबल त्रिदण्ड आदि पंच मात्राओं को स्वीकार करता हुआ मोक्ष को प्राप्त करे।
जब तक आयु रहे, तब तक त्रिदण्ड, उपवीत, वस्त्र (उत्तरीय), कौपीन (लँगोटी), शिक्य (छींका), पवित्र (पवित्री) को धारण करे।
यति की ये पाँचों मात्राएँ ही ब्रह्म (ॐकार) में समाहित हैं। इनका त्याग कभी नहीं करना चाहिए। इन सभी को मृत्यु के उपरान्त शरीर के साथ ही भूमि में गाड़ देना चाहिए।
विष्णुलिङ्ग व्यक्त और अव्यक्त ऐसे दो प्रकार के चिह्न विष्णु (संन्यासी) के कहे गये हैं। इन दोनों में से किसी एक का भी परित्याग कर देने पर संन्यासी पथभ्रष्ट हो जाता है। इसमें कुछ भी संशय नहीं।
त्रिदण्ड जो वैष्णवलिङ्ग (संन्यासी के चिह्न विशेष) के रूप में जाना जाता है। यह चिह्न ब्राह्मणों को मुक्ति प्रदान करने वाला है। यह चिह्न वेद का अनुशासन रूप एवं समस्त धर्मों का निर्वाण स्वरूप है।
हे सौम्य! संन्यासी के कुटीचक, बहूदक, हंस और परमहस - ये चार भेद होते हैं। ये चारों यज्ञोपवीत शिखा तथा विष्णु लिंग (संन्यासी के प्रतीक सर्वव्यापकता समदर्शिता) को धारण करने वाले शुद्ध चित्त, स्वयं अपनी आत्मा में ब्रह्म को प्रतिष्ठित करने की भावना करते हुए उपासना करने वाले, जप और यम-नियम का पालन करने वाले एवं सुन्दर स्वभाव वाले होते हैं। इस सम्बन्ध में यह ऋचा है - 'कुटीचक, बहूदक, हंस और परमहंस ये चार प्रकार अपनी-अपनी पृथक् वृत्तियों से भिन्न-भिन्न बताये गये हैं। ये सभी व्यक्त एवं अव्यक्त, बाह्य एवं अन्तः रूप विष्णु लिंग (संन्यास के चिह्न) को धारण करने वाले होते हैं।
ये पञ्चयज्ञ (गायत्री मन्त्र जप, योग, तप, स्वाध्याय एवं ज्ञान) तथा उपनिषदों के अर्थ का श्रवण करने वाले होते हैं। सभी अपने-अपने धर्मानुकूल कर्म करने वाले एवं ब्रह्मविद्या का आश्रय प्राप्त करने वाले हैं। ये सभी संसार रूपी वृक्ष को त्यागकर इसके मूलभाग (ब्रह्म) का आश्रय प्राप्त करने वाले तथा सभी कर्मकाण्ड आदि को छोड़कर सारभूत तत्त्व के रस का आनन्द प्राप्त करने वाले हैं। ये संन्यासी बाह्य क्रीड़ाओं को छोड़कर विष्णु के साथ ही क्रीड़ा करने वाले, विष्णु रूप आत्मा विष्णु का ही अर्चन एवं ध्यान करके कृतार्थ होते हैं।
सभी को मृत्यु पर्यन्त प्रातः, मध्याह्न एवं सायंकालीन संध्या, स्रान, तर्पण, मार्जन, उपस्थान तथा पञ्चयज्ञ (देवयज्ञ, पितृयज्ञ, नृयज्ञ या अतिथि यज्ञ, भूतयज्ञ एवं ब्रह्मयज्ञ) अवश्य ही करना चाहिए।
दश प्रणव (ॐकार) तथा सात व्याहृतियों (भूः, भुवः, स्वः, महः, जनः, तपः, सत्यम्) के सहित चार पाद युक्त एवं सिर (आपोज्योती इत्यादि) युक्त गायत्री का जप एवं यज्ञ त्रिकाल सन्ध्या के साथ करना चाहिए।
एकाग्रचित्त होकर भक्ति भाव से योग, यज्ञ भगवान् (विष्णु) तथा गुरु की सेवा और मन, वाणी एवं कर्म के द्वारा हिंसारहित तप रूपी यज्ञ सतत करते रहना चाहिए।
समस्त उपनिषदों का अभ्यास (पाठ) स्वाध्याय यज्ञ कहा गया है। 'ॐ' इस प्रकार उच्चारण करते हुए ब्रह्मरूपी अग्नि में ही आत्मा की आहुति दी जाती है अर्थात् आत्मा को ब्रह्म में विलीन किया जाता है।
वह (ॐकार ही) सभी श्रेष्ठ यज्ञों से भी उत्तम ज्ञानयज्ञ कहा गया है। इन सभी का ज्ञान ही दण्ड है, ज्ञान ही शिखा है और ज्ञान ही इनका यज्ञोपवीत है।
जिसकी शिखा (चोटी) एवं यज्ञोपवीत ज्ञानमय होता है। उसकी समस्त वस्तुयें ब्रह्मरूप ही हैं, ऐसा वेद का अनुशासन (आदेश है)।
हे प्रिय सोम्य! ये परिव्राजक जिस प्रकार प्रादुर्भूत होते हैं, वह बतला दिया गया है। ये संन्यासी काम, क्रोध, लोभ, मोह, दम्भ, दर्प (घमण्ड), असूया (दूसरे के गुणों में दोष निकालना), ममता, अहंकार आदि को पार करके, मान-अपमान, निन्दा-प्रशंसा को देखकर वृक्षवत् अविचल रहते हैं, काटे जाने (कष्ट पड़ने) पर भी कुछ बोलते नहीं। इस प्रकार से विद्वज्जन इस लोक में ही अमृत-जीवन्मुक्त हो जाते हैं। इस सन्दर्भ में यह ऋचा द्रष्टव्य है - ' भाई, पुत्रादि का पालन-पोषण करने के पश्चात् फिर कभी उनकी ओर नहीं देखे। दुःखादि सहते हुए पूर्व एवं उत्तर दिशाओं में अपने-अपने स्वरूप का अनुसंधान करते हुए भ्रमण करे।'
पात्र एवं दण्ड धारण करते हुए युग (दो-जीवात्मा-परमात्मा) मात्र के दर्शन करने वाले, विशाल जटा-वाले या मुण्डन किये हुए मस्तक वाले, उपवीत ही जिसका कुटुम्ब है, ऐसे संन्यासी को केवल अपने प्राणयात्रा के लिए मनुष्यों से भिक्षा माँगकर या बिना माँगे ही भिक्षा ग्रहण करते हुए निरन्तर विचरण करना चाहिए।
मिट्टी, लकड़ी की तुम्बी, श्रीफल, तन्तु ग्रथित यां पत्तों से निर्मित पात्र जिस तरह का भी मिले, ग्रहण कर लेना चहिए। चटाई, वृक्षों की छाल या सूखी घास से बनी कचरी, अजिन (कृष्णमृग चर्म) तथा जो पत्ते कीड़ों द्वारा खाये न गये हों, ऐसे श्रेष्ठ पत्तों के द्वारा बनाई गयी ओढ़नी-उत्तरीय को धारण करना चाहिए।
हंस (संन्यासी) को ऋतु सन्धि के समय क्षौर कर्म अर्थात् मुण्डन कराना चाहिए, किन्तु कुटीचक (यह भी संन्यासियों का एक भेद है) शिखा (जटा) को कभी न कटाये। जब विश्वरूप विराट् पुरुष भगवान् नारायण शयन करते हैं, तब तक चार मास (चौमासा) एक ही स्थान पर स्थिर चित्त से निवास करे।
इस प्रकार अन्य (श्रवण, ध्यान एवं समाधि आदि की) अवस्थाओं को प्राप्त करने का इच्छुक संन्यासी स्वकर्म करते हुए एक स्थान पर ही निवास हेतु रह जाये अथवा उसे अन्यत्र आश्रय प्राप्त कर लेना चाहिए। अपना निवास किसी देवालय में वृक्ष के मूल (जड़) के समीप में अथवा गुफा में कर लेना चाहिए तथा वहाँ निःसंग एवं सर्वथा अलक्षित (जन संसर्ग से दूर रहकर) बिना काष्ठ की अग्नि के समान शान्त चित्त होकर रहे। किसी को भी देखकर क्षुभित न हो, सभी में आत्मबुद्धि कर लेनी चाहिए।
यदि पुरुष अपनी आत्मा को ब्रह्म रूप में जान ले, तो फिर वह क्या चाहता हुआ किस इच्छा से शरीर का पोषण अथवा शोषण करे? अर्थात् उसे नहीं करना चाहिए।
धैर्यवान् ब्राह्मण उस अविनाशी परब्रह्म को पहचान कर उसी (ब्रह्म) में बुद्धि को स्थिर करे। अधिकाधिक शब्दाडम्बर में नहीं पड़ना चाहिए; क्योंकि यह सब वाणी का दुरुपयोग है।
वैराग्ययुक्त होकर ही स्थिर रहने की इच्छा करनी चाहिए। ब्रह्म के अतिरिक्त और कुछ नहीं है, ऐसा दृढ़ निश्चय कर ब्रह्म को पहचान एवं वैराग्य को भली-भाँति समझकर आत्माराम होकर सर्वत्र आत्मदर्शन करे।
जब हृदय में रहने वाली समस्त कामनाएँ शान्त हो जाती हैं, तब यह मरणधर्मा होता हुआ भी मृत्युहीन होकर ब्रह्मानन्द का रसास्वादन करता है।
हे प्रिय सोम्य! जो अपने इस नैष्ठिक संन्यासियों के धर्म को छोड़ देता है, वह पुरुषत्वनाशक, ब्रह्मघाती, गर्भघाती तथा महापातकी (के सदृश) होता है। जो (संन्यासी) इस वैष्णवी निष्ठा को त्याग देता है, वह चोर होता है। गुरुपत्नीगामी, मित्रद्रोही एवं कृतघ्न हो जाता है तथा समस्त लोकों से भ्रष्ट होकर अधोगति को प्राप्त होता है। इस सन्दर्भ में ये ऋचाएँ हैं - चोर, शराबी, गुरुपत्नीगामी, एवं मित्रद्रोही ये प्रायश्चित्त से शुद्ध हो जाते हैं; किन्तु व्यक्त एवं अव्यक्त स्वरूप विष्णु लिङ्ग (अनुशासन सूत्रों) को छोड़ने पर संन्यासी किसी भी तरह से पवित्र नहीं हो सकता है।
अन्तः तथा बाह्य विष्णु लिङ्ग को छोड़कर जो संन्यासी अपने आश्रम में ही निवास करता है अथवा आश्रम का त्याग कर देता है, वह प्रतिपल विपत्तियों से घिरा रहता है, ऐसे व्यक्तियों की सद्‌गति अनन्तकाल तक भी देखने में नहीं आती।
धैर्यवान् पुरुष समस्त आश्रमों का परित्याग करके मोक्षरूपी आश्रम में दीर्घकाल तक निवास करे। यदि मोक्ष-आश्रम से भी भ्रष्ट हो जाये, तो फिर उसको कहीं पर भी ठौर नहीं है।
जो (पुरुष) संन्यास आश्रम को ग्रहण करके अपने धर्म में स्थिर नहीं रहता, ऐसे (पुरुष) को आरूढ़ च्युत (पातकी) समझना चाहिए, क्योंकि वह (पुरुष) संन्यास आश्रम में आकर के भी पातकी हो चुका है, ऐसा वेद का अनुशासन (आदेश) है।
हे प्रिय सोम्य! जो पुरुष इस सनातन आत्मधर्म, विष्णु से सम्बन्धित निष्ठा को प्राप्त करके उसको प्रदूषित न करता हुआ प्रतिष्ठित रहता है, वह जितेन्द्रिय होता है। वह विशाल कीर्ति एवं लोकतत्त्व का ज्ञाता होता है। वह ब्रह्मवेत्ता होता है, वह सर्वज्ञ होता है। वह स्वयं प्रकाश स्वरूप होता हुआ परब्रह्म को प्राप्त करता है। वह अपने पितरों, सम्बन्धियों, बन्धुओं, मित्रों तथा समस्त प्रेमी सम्बन्धियों को संसार-सागर से तार देता है।
जो विद्वान् इस संन्यास-धर्म को ग्रहण करता है, उसके कुल में सौ पीढ़ी पूर्व तथा तीन सौ पीढ़ी बाद तक जन्म लेने वालों का उद्धार हो जाता है। ऐसे श्रेष्ठ कृत्य करने वाले विद्वान् संन्यासी कभी-कभी ही इस लोक में प्रकट होकर इसे कृतार्थ करते हैं।
विद्वान् धर्मिष्ठ संन्यासी तीस पर (बाद की), तीस अपर (पूर्व की) एवं तीस पर से भी पर (बाद से बाद की) पीढ़ियों-पूर्वजों को तार देता है, ऐसा श्रुति का वचन है।
प्राणों के कण्ठगत (मृत्यु के समीप) होने पर भी जो इस प्रकार कह दे कि 'मैंने संन्यास ले लिया है', तो ऐसा समझना चाहिए कि उसने पितरों को तार दिया, ऐसी वेद की आज्ञा (अनुशासन) है।
हे प्रिय सोम्य! विद्वान् पुरुष को चाहिए कि वह इस सनातन आत्मनिरूपक धर्म को विष्णु सम्बन्धी निष्ठा को सम्यक् रूप से निर्वाह किये (स्वयं आचरण किये) बिना उपदिष्ट न करे। इसके साथ ही जो वेदान्त का ज्ञानी न हो, आत्मबोध युद्ध न हो, वीतराग न हो, शुद्धचित्त, विनीत एवं जिज्ञासु न हो, ऐसे पुरुष को इसका उपदेश नहीं करना चाहिए। इस बात को पोषण प्रदान करने वाली ऋचाएँ ये हैं - ब्रह्मविद्या ब्राह्मण के समीप में आयी एवं बोली - हे ब्रह्मन्! मेरी रक्षा करो, मैं ही तुम्हारी निधि हूँ। मुझे दूसरों के गुणों में दोष देखने वाले कुटिल, धूर्त, मूर्ख पुरुष को उपदिष्ट मत करो। ऐसा करने पर मैं प्रभावशालिनी न रह सकूंगी।
जिसे पवित्र, अभिमानशून्य, सावधान, मेधावी एवं ब्रह्मचारी समझे, ऐसे समीप में आये हुए उस जिज्ञासु की भली-भाँति परीक्षा करके इस आत्मतत्त्व बोधिका वैष्णवी विद्या का उपदेश करना चाहिए।
शिक्षा प्राप्त करने के पश्चात् भी जो (पुरुष) मन, वाणी तथा कर्म से अपने गुरुजनों का आदर नहीं करते, ऐसे लोगों के अन्न को कल्याण की इच्छा रखने वाले ग्रहण नहीं करते तथा गुरु भी उसके अन्न को स्वीकार नहीं करते। ठीक वैसे ही यति भी उस कृतघ्न के घर का अन्न ग्रहण न करे, ऐसा श्रुति का कथन है।
गुरु ही परम धर्म है, गुरु ही परम गति है। ज्ञान प्रदाता गुरु को जो पुरुष आद्रित नहीं करता अर्थात् उनका सम्मान नहीं करता, उस पुरुष का पढ़ा हुआ (उसकी शिक्षा), उसकी तपस्या, उसका ज्ञान धीरे-धीरे उसी प्रकार क्षीण होकर समाप्त हो जाता है, जिस प्रकार कच्चे घड़े से जल।
जिस पुरुष की देवताओं में परम भक्ति होती है एवं जैसे देवताओं में वैसे ही गुरु में भी उसकी परम भक्ति होती है। ऐसा (पुरुष) ब्रह्मज्ञानी परम पद की प्राप्ति करता है, ऐसा वेदानुशासन है, वेद की आज्ञा (आदेश) है। इस प्रकार यह उपनिषद् (विद्या) पूर्ण हुई।
वह (ब्रह्म) पूर्ण है, यह (जगत्) भी पूर्ण है। (उस) पूर्ण ब्रह्म से ही यह पूर्ण विश्व प्रादुर्भूत हुआ है। उस पूर्ण ब्रह्म में से इस पूर्ण जगत् को निकाल लेने पर पूर्ण ब्रह्म ही शेष रहता है। ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें