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शाट्यायनीय • अध्याय 1 • श्लोक 21
पात्री दण्डी युगमात्रावलोकी शिखी मुण्डी चोपवीती कुटुम्बी। यात्रामात्रं प्रतिगृह्णन्मनुष्यात् अयाचितं याचितं वोत भैक्षं ॥
पात्र एवं दण्ड धारण करते हुए युग (दो-जीवात्मा-परमात्मा) मात्र के दर्शन करने वाले, विशाल जटा-वाले या मुण्डन किये हुए मस्तक वाले, उपवीत ही जिसका कुटुम्ब है, ऐसे संन्यासी को केवल अपने प्राणयात्रा के लिए मनुष्यों से भिक्षा माँगकर या बिना माँगे ही भिक्षा ग्रहण करते हुए निरन्तर विचरण करना चाहिए।
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