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शाट्यायनीय • अध्याय 1 • श्लोक 22
मृद्दार्वलाबूफलंतन्तुपर्णपात्रं तत्तथा यथा तु लब्धम् । क्षाणं क्षामं तृणं कन्थाजिने च पर्णमाच्छादनं स्यादहतं वा विमुक्तः ॥
मिट्टी, लकड़ी की तुम्बी, श्रीफल, तन्तु ग्रथित यां पत्तों से निर्मित पात्र जिस तरह का भी मिले, ग्रहण कर लेना चहिए। चटाई, वृक्षों की छाल या सूखी घास से बनी कचरी, अजिन (कृष्णमृग चर्म) तथा जो पत्ते कीड़ों द्वारा खाये न गये हों, ऐसे श्रेष्ठ पत्तों के द्वारा बनाई गयी ओढ़नी-उत्तरीय को धारण करना चाहिए।
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