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शाट्यायनीय • अध्याय 1 • श्लोक 23
ऋऋतुसन्धौ मुण्डयेन्सुण्डमात्रं नाधो नाक्षं जातु शिखां न वापयेत्। चतुरो मासान्धुवशीलतः स्यात्स यावत्सुप्तोऽन्तरात्मा पुरुषो विश्वरूपः ॥
हंस (संन्यासी) को ऋतु सन्धि के समय क्षौर कर्म अर्थात् मुण्डन कराना चाहिए, किन्तु कुटीचक (यह भी संन्यासियों का एक भेद है) शिखा (जटा) को कभी न कटाये। जब विश्वरूप विराट् पुरुष भगवान् नारायण शयन करते हैं, तब तक चार मास (चौमासा) एक ही स्थान पर स्थिर चित्त से निवास करे।
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