हंस (संन्यासी) को ऋतु सन्धि के समय क्षौर कर्म अर्थात् मुण्डन कराना चाहिए, किन्तु कुटीचक (यह भी संन्यासियों का एक भेद है) शिखा (जटा) को कभी न कटाये। जब विश्वरूप विराट् पुरुष भगवान् नारायण शयन करते हैं, तब तक चार मास (चौमासा) एक ही स्थान पर स्थिर चित्त से निवास करे।
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