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शाट्यायनीय • अध्याय 1 • श्लोक 28
यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते कामा येऽस्य हृदि श्रिताः। अथ मत्यर्थोऽमृतो भवत्यत्रं ब्रह्म समश्रुते ॥
जब हृदय में रहने वाली समस्त कामनाएँ शान्त हो जाती हैं, तब यह मरणधर्मा होता हुआ भी मृत्युहीन होकर ब्रह्मानन्द का रसास्वादन करता है।
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