हे प्रिय सोम्य! विद्वान् पुरुष को चाहिए कि वह इस सनातन आत्मनिरूपक धर्म को विष्णु सम्बन्धी निष्ठा को सम्यक् रूप से निर्वाह किये (स्वयं आचरण किये) बिना उपदिष्ट न करे। इसके साथ ही जो वेदान्त का ज्ञानी न हो, आत्मबोध युद्ध न हो, वीतराग न हो, शुद्धचित्त, विनीत एवं जिज्ञासु न हो, ऐसे पुरुष को इसका उपदेश नहीं करना चाहिए। इस बात को पोषण प्रदान करने वाली ऋचाएँ ये हैं - ब्रह्मविद्या ब्राह्मण के समीप में आयी एवं बोली - हे ब्रह्मन्! मेरी रक्षा करो, मैं ही तुम्हारी निधि हूँ। मुझे दूसरों के गुणों में दोष देखने वाले कुटिल, धूर्त, मूर्ख पुरुष को उपदिष्ट मत करो। ऐसा करने पर मैं प्रभावशालिनी न रह सकूंगी।
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