अथ खलु सोम्येमं सनातनमात्मधर्म वैष्णवीं निष्ठां लब्ध्वा यस्तामदूषयन्वर्तते स वशी भवति । स पुण्यश्नोको भवति । स लोकज्ञो भवति । स वेदान्तज्ञो भवति। स ब्रह्मज्ञो भवति । स सर्वज्ञो भवति। स स्वराड् भवति। स परं ब्रह्म भगवन्तमाप्नोति । स पितृन्संबन्धिनो बान्धवान्सुहृदो मित्राणि च भवादुत्तारयति ॥
हे प्रिय सोम्य! जो पुरुष इस सनातन आत्मधर्म, विष्णु से सम्बन्धित निष्ठा को प्राप्त करके उसको प्रदूषित न करता हुआ प्रतिष्ठित रहता है, वह जितेन्द्रिय होता है। वह विशाल कीर्ति एवं लोकतत्त्व का ज्ञाता होता है। वह ब्रह्मवेत्ता होता है, वह सर्वज्ञ होता है। वह स्वयं प्रकाश स्वरूप होता हुआ परब्रह्म को प्राप्त करता है। वह अपने पितरों, सम्बन्धियों, बन्धुओं, मित्रों तथा समस्त प्रेमी सम्बन्धियों को संसार-सागर से तार देता है।
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